मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
वसुधा कितनी अनुशासित है, ग्रहपिण्ड हैं कितने कालनिष्ठ
सारे पर्वत, सारी नदियां, सारे पशु-पक्षी ऊष्माणु,
योद्धा-प्रचण्ड ये शक्तिमान, मानव-अतिमानव, ये दानव,
सारे पथदर्शक, प्रतिहारी, मंत्री, शासक, नेता सारे,
सारे खरशर, ये सव्यसाद, सारे पुण्यात्मा, ये पापी,
ऋषिवर, मनीष ये विज्ञानी, सारे संगीत-कला पण्डित,
ये चिदाकाश सौन्दर्यवाह, किसकी इंगिति पर चलते हैं,
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मै कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
यह किस अदृश्य की लीला है, जो काल-नियति की क्रीड़ा है,
बस वायु बना, जिसका खम्भा, यह बेतारों की वीणा है ।
कितना असीम इसका पौरुष, कितना विशाल इसका वैभव,
मिट्टी का कह लो, तुमा इसको, सोने का दाम लगा डालो,
हीरे की इसकी माप-तौल, मोती के हाट चला डालो,
यह मोल कहीं, बेमोल कहीं, मिट्टी के मोल न बिकता है,
यह उस अनन्त की लीला की, कैसी अद्भुत, संरचना है ।
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
यह किस अनन्त की लीला है, जो बिन कागद के चित्रित है,
अनगिन रंगों से मज्जित है, बहु अनुभावों से पूरित है ।
अनगिन साजों से शोभित है, मर्यादाओं से पालित है ।
इसकी गति थिरक हिला देती, तड़-तड़ित् वायु-वर्षा देती,
सारी वसुधा को सींच-सींच, श्यामल कण-शस्य भरा देती,
घन-वायु दिशा दिखला देती, वसुधा जीवन्त बना देती ।
ब्रह्माण्ड बना, जिसका कारण, वह किस विभुता का स्पन्दन है ?
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
वह सुषमा-सी सौन्दर्य नटी, मधु-सुधा लिए है, कहां खड़ी,
पग की पायल की छाम-छूम से, मन के घुंघरू बजा रही ।
जब मस्ती और थिरकती है, पलकें भीगी-सी हो जातीं ।
नर्तन उसका क्या मचल-मचल, स्वर्गिक स्वर लहरी लाता है ।
जब नभ के बादल भेद-भेद, अपना परिचय दे जाते हैं ;
जब सरगम से बनकर मन में, हृद्तंत्री तार जुड़ाते हैं ।
उन सप्तस्वरों की थिरकन में, कितनी मादकता आ जाती ?
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मै कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
मादक वसन्त जब आता है, मन की उमंग बन जाता है ;
तब तरुवर मुकुट लगाते हैं, पौधों को शिखी बनाते हैं,
कोयल जब कूक लगाती है, पंचम-स्वर में कुछ गाती है,
मधु के सौरभ में झूम-झूम, कितने अलि-सुत बौराते हैं .
प्रिय के चिन्तन में हो विह्वल, प्रेयसि कुछ बोल न पाती है
होठों की भाषा मौन बनी, आंखों से ढलती जाती है ।
सौन्दर्य घनत्व अकविता की, क्या गहराई-ऊंचाई है ।
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
निर्माण मनोहर होता है, चित्रण होता, कितना सजीव ;
संगीतों की स्वर-लहरी में, जब जाता है, सब जगत डूब ।
वह तभी जगाकर सब जग को, लोकित आनन्दित करता है ;
फिर, आशा और निराशा के मिस, गुन-गुन-गुन कुछ गुनता है ।
सोचता, बहुत कुछ, है, मन में, पर, पाता है, नामांश कहां ?
जो हाथ नहीं कर पाते हैं, वह मन सब कुछ कर जाता है ;
फिर, मानव की चिति-प्रज्ञा की, कैसी चेतनता क्या जानूं ?
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
महाप्रलय जब आता है, वह अपना त्रास दिखाता है ।
तब कालपुरुष का रोष सभी को, एक-एक चट जाता है ।
सब खड़े-खड़े रह जाते हैं, बस, पड़े-पड़े रह जाते हैं ।
क्या जीव-जन्तु, जंगम-स्थावर, सब कालमुखी हो जाते हैं ।
फिर, पुरुष-प्रकृति हो एक तत्त्व, वसुधा जलमय हो जाती है ।
मनु भी न कभी बच पाता है, विभु की विभुता मिट जाती है ;
फिर काव्य कहां, लेखनी कहां, कैसा विधान, परिवर्तन है ।
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
यह सृष्टि जगत का शाश्वत क्रम, अपना करतब दिखला जाती ।
उस जल प्लावन को सिमटाकर, बहु जीव-जन्तु उपजा जाती ।
जब पुरुष-प्रकृति के बीजरूप, शतरूपा-मनु आ जाते हैं ;
तब मानव की प्रतिमाओं से, वसुधा के घऱ भर जाते हैं ।
चरैवेति समवेत स्वरों से, जब वह अलख जगाता है ।
गीता का संदेश गूंजकर, वसुधा पर छा जाता है ।
इस पंचभूत निर्मित जग की, कितनी स्थायी चेतनता है ।
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?
-नियति निक्षेप