रविवार, 21 अक्टूबर 2012


नियति चक्र 


   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

कहीं कभी पर्वत चढ़ना हो
या उड़ जाना हो आकाश ।
मन के पैरों चढ़कर देखो
मन विमान से हो न हताशा ।।

तब तुम चलो शिखर छूने को
मार्ग जटिल हो पथ में शूल ।
वायुयान पर चढ़ो कुहासों
मध्य कहीं कितना हो तूल ।।

मन का रथ सारथी बने
जब वह तुमको ले जाएगा ।
कहीं शिखर या अन्तरिक्ष भी
चरणों में झुक जाएगा ।।

                -नियति निसर्ग

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