शनिवार, 5 जनवरी 2013


विडम्बना 

शमित, भस्मि जौहर की, कितनी शताब्दियों से ।
तथापि, सतियों में निरन्तर आस्था,
घोर अवहेला सावित्रियों की
जिनकी तुषाग्नि सुबक रही, अक्षुण्ण
असंख्य अबलाओं के क्रन्दन में, बन भर्त्सना बारूद ।

हे धर्म धुरीन ! अपनी ड्योढ़ी देख
जहां दे रखा है, आज भी आजीवन कारावास
बर्बरता की लौह-श्रृंखला, जर्जरित अनुशासन,
विगलित प्रवंचना,
पाशविकता, लुण्ठन, जल्पना, अवगुण्ठन ।
ये ही तेरे अवदान- कितने हेय, हास्यास्पद, निष्करुण ।

तेरा यह म्लान आवास स्वयं में एक अपंग देवराला,
जहां सहस्त्र देवरालों के, रुपकुमारियों के
जघन्य, कुत्सित, वीभत्स नृत्य, पर, दृष्टि का सर्वथा अभाव ।
गान्धारी, धृतराष्ट अथवा सुयोधन ।
सभी आचारसम्मत संज्ञायें विलुप्त, फिर, तू निरुत्तर क्यों ?
तेरी ये वधुएं, विधवाएं, कुमारिकाएं ।

यश-मान तेरे सहचर, लांछना हमारी संगिनि,
हास को हताशा, रुदन को अगाध अश्रु,
मुक्ति-कामना स्वप्न ।
मैं नारी, अबला, सावित्री कालान्तर से,
कातर, निरुपाय, पीड़ित, प्रताड़ित, मर्दित-घर्षित ।

                                             --नियति निक्षेप

गुरुवार, 3 जनवरी 2013



अबलाओं की पुकार 
-प्रो. श्यामलाल उपाध्याय 

बहन-बेटियां बिलख रहीं हैं, भरी नींद सो रहा देश । 
भय-कातर ललनायें टूटीं, यह तुम तक संदेश ।। 

समय आ गया, अब संसद को, आर्तनाद सुनना होगा । 
द्रौपदियों को विपदाओं से, मुक्त उन्हें करना होगा ।। 

बचा नहीं सकते तो ले लो, रहा चूड़ियों का उपहार । 
सत्ता में तुम रह न सकोगे, हुई तुम्हारी कर्कश हार ।।

दुःशासन हैं शासन करते, सता-सताकर देते ताप ।
दामिनियां कड़केंगी ऊपर, सह लेना उनके परिताप ।। 

अबलायें सबलायें होंगी, आग उगलनेवाली । 
नारी जग के आर्तनाद से, भस्मि शिखा बलने वाली ।।