कन्या-भ्रूम का प्रलाप !
-श्यामलाल उपाध्याय
मां ! मैं कन्या-भ्रूण, पालित तेरी कोख में
चाहिए, तेरा वात्सल्य, असीम स्नेहिल स्पर्श
मैं प्राणदा तुलसी बन, विचरूं, तेरे आंगन
गोकुल से वृन्दावन, मथुरा से द्वारका धाम
पास-दूर, आह्लाद-अवसाद्,
संयोग-वियोग, गुणन-भाग ।
चाहूं, प्रकृति दर्शन,
अनन्त आकाश, प्रात-सांध्य
सूर्य-चन्द, वायु-आकाश,
पर्वत-नद, सागर, पुष्कर ह्रद,
प्रस्फुटित, संकुचित, लसित-पुष्प,
पशु-पक्षी, कीट-भृंग, तोल ग्राम,
वीथी-वाटिका, नगर-महानगर,
रच-चहक, गूंज-अनुगूंज, हास-लास,
विलास और मुझमें तेरी जैसी मां ।
करुणार्द्र-स्नेहिल, वात्सल्यपूर्ण,
ममतामयी, प्रकृतिमयी मां ।
तू अपनी कोख की रक्षा कर
इसे न कर, विरूप, शिव से शव
तू सृष्टि बीज, रयि सोमतत्त्व
बिन्दु में सिंधु, शक्ति-दुर्गा-चण्डी
रणचण्डी बन ललकार, उठे करवाल
ले, मेरी सुरक्षा का पूर्ण भार,
समस्त कन्या-भ्रूण-भार,
सबको दिखा सौरज, बने तेरा उद्घोष,
हत्या भ्रूण कभी न हो; अनिवार्यतः
भारतीय संहिता धारा-निषेध के अन्तर्गत;
मां उसे सींचे, करे, उसका पोषण ।
कन्या-भ्रूण का आभार ज्ञापन-
मैं हूं, तेरी कन्यका, तू अतीत से मातृ ।
जन्मान्तर दर्शन करूं, रहे, सदा तू धातृ ।।