शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013


मेरे अतीत के अनुभव  

कोलकाता प्रवास के प्रारम्भिक वर्ष ः 
पचास वर्ष पूर्व महानगर मेरे लिए एक अपरिचित प्रवास था । एक सामान्य होटल के माध्यम से लोगों से मिल-जुल कर परिचय प्राप्त किया और आवास की व्यवस्था की । महानगर की यात्रा बस, ट्राम द्वारा पांच पैसों में होती थी, भोजन पचास से साठ पैसों में सुलभ था । सामान्य चावल तीस पैसों और बासमती, देहरादून साठ पैसों में एक किलोग्राम आते थे । बंगीय हिन्दी परिषद में तीसरे रविवार की संध्या को आचार्यप्रवर डॉ. ललिता प्रसाद सुकुल, प्रो. रामनारायण सिंह के साथ कई अन्य कवि एवं साहित्यकार आते । कार्यशाला में विषय निर्धारित होते और कवि अपनी रचनाएं, उपोक्तियां सुनाते ; बड़ा आनन्द आता । परिचय, मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन और सुलभ थे । कुछ ही दिनों में महानगर से लगाव-सा हो गया । पठन-पाठन-अध्यापन के सुयोग भी एक वर्ष के अन्तराल मिलते गए ।

अंग्रेजी माध्यम की पाठशाला-जीवन-शैली ः
मैंने अंग्रेजी माध्यम पाठशाला से बहुत कुछ सीखा । सबसे पहले हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं को सीखने का भरपूर अवसर मिला । अध्यापक, आचार्य-प्राचार्य से लेकर मध्यवित्त, कुलीन, वरिष्ठ अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, सेठ, साहुकार सभी से मिलने का अवसर मिला । सुना था, अंग्रेजी पढ़ने पर नौकरी मिलती है पर हिन्दी नहीं । यहां सब कुछ मिला- हिन्दी, इंग्लिश, मनोनुकूल अध्यापन, संयमित अध्यापकवर्ग अथवा आत्मतोष ।

सोमवार, 11 मार्च 2013


प्रो. श्यामलाल उपाध्याय के प्रति ः 


संस्कृति के पहरेदार नमन !

               -डॉ. लक्ष्मीकान्त त्रिपाठी 'विमल'

नम्रता सिन्धु उत्कर्ष शिखर, वाणी से झरते मधुर बैन ।
पग-पग पर स्नेहिल स्नेह मिले, हर कदम बिखेरे अमन चैन ।।
तुम सौम्य सरल निर्मल स्वभाव, करते भाषा का संवर्धन ।
तन मन वाणी से चिदाकाश को, ले समेटते श्रीवर्धन ।।

शब्दों के सक्षम शिल्पकार, जीवन्त सृजन उद्गार नमन ।
युगरत्न शलाकापुरुष प्रवर, साहित्य सिन्धु के ज्वार नमन ।।

सादगी तुम्हारी मान रही, निज कर्मठता अरमान रही ।
व्यक्तित्व उदात्त उत्कृष्ट प्रखर, तेरी वाणी वरदान रही ।।
लहरों से ले संकल्प शक्ति, तुम बढ़े सदा जीवनपथ पर ।
विश्वास सुदृढ़ चट्टानों सा, ज्यों बढ़े अंशुमाली नभ पर ।।

हे ! पुरुष प्रवर सरस्वती पुत्र, नर पुंगव बारम्बार नमन ।
सृष्टा-दृष्टा कविकर्मी को, युग-युग का शत-शत बार नमन ।।

क्रमशः......

रविवार, 17 फ़रवरी 2013


कन्या-भ्रूम का प्रलाप !


   -श्यामलाल उपाध्याय 

मां ! मैं कन्या-भ्रूण, पालित तेरी कोख में
चाहिए, तेरा वात्सल्य, असीम स्नेहिल स्पर्श
मैं प्राणदा तुलसी बन, विचरूं, तेरे आंगन
गोकुल से वृन्दावन, मथुरा से द्वारका धाम
पास-दूर, आह्लाद-अवसाद्,
संयोग-वियोग, गुणन-भाग ।

चाहूं, प्रकृति दर्शन,
अनन्त आकाश, प्रात-सांध्य
सूर्य-चन्द, वायु-आकाश,
पर्वत-नद, सागर, पुष्कर ह्रद,
प्रस्फुटित, संकुचित, लसित-पुष्प,
पशु-पक्षी, कीट-भृंग, तोल ग्राम,
वीथी-वाटिका, नगर-महानगर,
रच-चहक, गूंज-अनुगूंज, हास-लास,
विलास और मुझमें तेरी जैसी मां ।
करुणार्द्र-स्नेहिल, वात्सल्यपूर्ण,
ममतामयी, प्रकृतिमयी मां ।
तू अपनी कोख की रक्षा कर
इसे न कर, विरूप, शिव से शव
तू सृष्टि बीज, रयि सोमतत्त्व
बिन्दु में सिंधु, शक्ति-दुर्गा-चण्डी
रणचण्डी बन ललकार, उठे करवाल
ले, मेरी सुरक्षा का पूर्ण भार,
समस्त कन्या-भ्रूण-भार,
सबको दिखा सौरज, बने तेरा उद्घोष,
हत्या भ्रूण कभी न हो; अनिवार्यतः
भारतीय संहिता धारा-निषेध के अन्तर्गत;
मां उसे सींचे, करे, उसका पोषण ।
कन्या-भ्रूण का आभार ज्ञापन-
मैं हूं, तेरी कन्यका, तू अतीत से मातृ ।
जन्मान्तर दर्शन करूं, रहे, सदा तू धातृ ।।

अबलाओं की पुकार 

-प्रो. श्यामलाल उपाध्याय 

बहन-बेटियां बिलख रहीं हैं, भरी नींद सो रहा देश । 
भय-कातर ललनायें टूटीं, यह तुम तक संदेश ।। 

समय आ गया, अब संसद को, आर्तनाद सुनना होगा । 
द्रौपदियों को विपदाओं से, मुक्त उन्हें करना होगा ।। 

बचा नहीं सकते तो ले लो, रहा चूड़ियों का उपहार । 
सत्ता में तुम रह न सकोगे, हुई तुम्हारी कर्कश हार ।।

दुःशासन हैं शासन करते, सता-सताकर देते ताप ।
दामिनियां कड़केंगी ऊपर, सह लेना उनके परिताप ।। 

अबलायें सबलायें होंगी, आग उगलनेवाली । 
नारी जग के आर्तनाद से, भस्मि शिखा बलने वाली ।। 

पर्यावरण 

   -श्यामलाल उपाध्याय 

युग ने कहां रचा पुरुष, युग पौरुष अवदान ।
वह अपने पुरुषार्थ से, बनता, सदा महान ।।
जो जग देखा था कहीं, नहीं रहा, वह आज ।
क्या आश्चर्य बना, जगत, सजता, अनगिन साज ।।
आर्य परम्परा का जीवन था, प्रकृति मूल आधार ।
इसीलिए झंकृत हुए, मंत्ररूप में इसके तार ।।
जन ने अवहेला की इसकी, कदाचार इससे आरम्भ ।
ईति-भीति, भय-ताप, आधि और व्याधि हुई प्रारम्भ ।।
प्रकृति चलाए दमन चक्र, इसका जन उत्तरदायी ।
अपने बल पौरुष से है, वह, बना, आज विषपायी ।।
यह विषपान बनेगा, घातक, क्या शंकर बन पाएगा ।
मानव का अतिक्रमण उसे, बस, अंधक, महिष बनाएगा ।।
मानव का आगम हितकर, सुखकर कैसे हो पाएगा ।
सन्तुलन विकल्प की भाषा, पर्यावरण सिखाएगा ।।
कहीं फूल की कलियां रोतीं, कहीं खिले, वे फूल ।
कहीं सुकोमल पत्र बिलखते, आतुर बने, समूल ।।
कहीं सरीसृप, कीट, भृंग, असहाय सांस को तरसें ।
कहीं वन्य पशु, कहीं पालतू, प्राण विकलता परसें ।।
अपने दुष्कर्मों के फल, मानव विलुप्त हो जाएगा ।
अनुशासन-विरमित कर्मों का, कहीं उचित फल पाएगा ।।
प्रकृति सहचरी बनी रहे, तादात्म्य रहे, जीवन भर ।
व्यक्ति असंग, निसंग रूप से जुड़ा रहे, अति दृढ़तर ।।
जब तक उसके पास रहेगा, आधि-व्याधि से दूर ।
वह उसकी कर देगी सारे, काम्य मनोरथ पूर ।।


उन्मेष 

   -श्यामलाल उपाध्याय 

अभाव के कोटर में साधन विहीन
कालान्तर से बैठा निरुद्देश्य जन
ढोता रहा अबाध
अतीत के रोदन प्रलाप
दुर्निवार काल कर्कशता -
जनित विषाद ।

आशा के डिम्ब से
सन्तोष के रसायन प्रलेप
कर्म-साधना की ऊष्मा
और जिजीविषा की
शक्ति से संचालित
सरसे यह जीवन ।

हरने को अवसाद
नव प्रात से संजोया मन
खिले रस मिश्रित
उस मधुमय वसंत से
झंझावात शक्तिहीन सौरभ सम्पन्न मन
नाचे मयूर उस मधुश्री की छांव में ।

जन-मन की शक्ति से
भागे भय जनित भीति उठे, वह वर्ग
पड़ा है, जो शताब्दियों से
समाज की कठोरता से
पीड़ित-प्रकम्पित, पताड़ित-उपेक्षित
अभिशप्त-परित्यक्त ।


राष्ट्रभाषा के स्वर

   -श्यामलाल उपाध्याय 

जिसके भाषी अधिक जन, बसते हों उस देश ।
उसे राष्ट्रभाषा कहें, सहज शारदा शेष ।।

जो भाषा साहित्य से, अति समृद्ध हो जाय ।
भाषा है अधिकारिणी, अतिशय आदर पाय ।।

जिस भाषा में शब्द हों, विस्तृत और समृद्ध ।
वही राष्ट्रभाषा बने, हो सर्वोपरि सिद्ध ।।

क्षेत्र बड़ा व्यवहार में, व्यापक औ' विस्तीर्ण ।
वही राष्ट्रभाषा बने, सदा-सदा उत्तीर्ण ।।

लक्ष्मण, शिवप्रसाद से लल्लू, सदल मिश्र से खान ।
लाल सदासुख वीर थे, इनकी ही बस जान ।।

नव जागरण बीज बो, हरिश्चन्द्र से वीर ।
जैसे बाल, प्रताप थे, ऐसे थे वे धीर ।।

हिन्दी होकर अग्रणी विश्व स्तर यह पाय ।
बने विश्वभाषा कहीं, भारत बलि-बलि जाय ।।

हिन्दी के स्वर गा रहे, तुलसी, सूर, कबीर ।
गांधी, काका, सन्त ने, हर ली सबकी पीर ।।

जयशंकर से देविका, कहीं निराला पंत ।
हिन्दी के स्वर साधकर, सभी हुए श्रीमन्त ।।

वर्षों से हम गा रहे हिन्दी के वे गान ।
जनगण की भाषा बने, रख ले सबका मान ।।

घर बाहर हिन्दी चले, राह हाट बाजार ।
गांव नगर हिन्दी चले, सात समुन्दर पार ।।

हिन्दी पारस रूप है, स्वर्ण बनाती आप ।
जनमानस को ज्ञान दे, हर लेती परिताप ।।

हिन्दी का चिन्तन सहज, हिन्दी का आचार ।
हिन्दी के संस्कार से, बनते आप विचार ।।

हिन्दी भाषा देश की, क्या साहित्य बनाय ।
इसकी दीपित दीप्ति से, धरा दीप्त हो जाय ।।

-नियति निसर्ग