कोई पूछे, उसे बता दूँ, कैसे जीता हूँ।
सूखा कहाँ पनप उठता, मुरझाया भी हरियाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर, झड़ियों सा लहराता।
फूल कहीं महकाता मन को, कलिका आस बँधाती।
समझ न पाया, अब तक जग, नियति कहाँ ले जाती।
कैसे, पनप रही, हरियाली, क्या थपेड़ क्या झड़ियाँ।
कैसी महक कहाँ वह आशा, क्या उम्मीद की लड़ियाँ।
दु:ख में बीत गये, दिन सारे, आँखें रोती जातीं।
दिन-दिन मोती ही बरसाकर, अपनी व्यथा सुनातीं।
कोई पूछे, उसे बता दूँ, कैसे जीता हूँ
जीवन की दुखियारी चादर कैसे सीता हूँ।
सूखा कहाँ पनप उठता, मुरझाया भी हरियाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर, झड़ियों सा लहराता।
फूल कहीं महकाता मन को, कलिका आस बँधाती।
समझ न पाया, अब तक जग, नियति कहाँ ले जाती।
कैसे, पनप रही, हरियाली, क्या थपेड़ क्या झड़ियाँ।
