बुधवार, 31 अक्टूबर 2012


स्वाधीनता की नियति 


स्वाधीनता प्रणम्य है, जनमानस को आज । 
वह अपने पुरुषार्थ से, करे जगत के काज ।। 

स्वाधीनता दे सके, भोजन वस्त्र आवास । 
शिक्षा, स्वास्थ्य सदा रहें, प्रस्तुत उसके पास ।। 

जो स्वतंत्रता दूर हो, जनमानस के काज । 
पराधीनता है भली, ढकती तन ही लाज ।। 

कुर्सी की स्वाधीनता, करे घृणित अपराध । 
लोक लाज को बेचकर, पूरे अपनी साध ।। 

जनता की चिन्ता नहीं, स्वाधीनता अनर्थ । 
कुर्सी के स्वामी बने, किया कराया व्यर्थ ।। 

मुंह पर पट्टी है जहां, कुछ कहना अपराध । 
वहां प्राण का भय रहा, बाधित बाध अबाध ।। 

चक्की है स्वाधीनता, पिसते कितने लोग । 
खाने को भोजन नहीं, यही मृत्यु का शोक ।। 

शिविरों का अब कुम्भ है, जिसमें भेड़ धसान । 
सुख सपना जन का हुआ, देवल कहें मसान ।। 

स्वाधीनता कहीं भली, दुश्चिन्ता दिन दूर । 
समता सुख की रात दे, हुआ मनोरथ पूर ।। 

भोजन वस्त्र विहीन हो, हो स्वतंत्रता हास । 
ऐसा हो जीवन दुःखद, बस वैतरणी पार ।। 

                                         -नियति निसर्ग 

जनतंत्र की अवहेला !


हम भारत के वीर सिपाही, रखें, देश की लाज ।
अपने दृढ़ व्रत नेम से, करें, राष्ट्र के काज ।।

फैले इस आतंक को जड़ से करें, विनष्ट ।
जो हैं, इनके साथ में इनको करना नष्ट ।।

राष्ट्रभावना जनमानस में जहां गई वह जाग ।
क्या आतंक अनर्थ देश से जाएंगे, सब भाग ।।

बाग उजड़ता जा रहा, माली है, उसमर्थ ।
इसकी रक्षा के लिए, होना, उसे समर्थ ।।

कितने मारे जा रहे, सदा रहे, निष्पाप ।
सारे पापी मुक्त हैं और रहित परिताप ।।

पुण्य अधोगति पा रहा, सुख से जीता, पाप ।
देश बचा तो हम बचे, कहां कौन निष्पाप ।।

भोजन को हैं, तरसते, कितने निर्धन लोग ।
कितने सुख से जी रहे, कितने पाते, भोग ।।

दवा चाहती दाम है, दाम बिना सब व्यर्थ ।
कैसे जीवन जी सके, मिलता, जहां न अर्थ ।।

मूल्य वृद्धि एक मंत्र है, शोषण है, एक तंत्र ।
मंत्र-तंत्र के योग से बना, भ्रष्ट जनतंत्र ।।

कौन बचाए तंत्र को, कौन दिखाए, राह ।
झोली भरने की ठनी, कहां राह की चाह ।।  

                                 -नियति निसर्ग

कहीं देर न हो जाय !


अल्फ्रे़ड पार्क, आज शहीद उद्यान, 
तीर्थराज, तीर्थस्थल
क्रान्तिकारी के प्रति सर्वोत्तम सम्मान । 
मां की ममता छोड़, भारतमाता के लिए
अन्त तक जूझता रहा, कर दिया, आत्मोत्सर्ग, 
आत्म बलिदान ; 
पर मां के बिखरे आंसू आज मांग रहे, 
भारत के आधुनिक नौनिहालों से, 
देशभक्तों से उनकी कारगुज़ारी । 

शहीद उद्यान आज बना है - 
चोर, बटमारों का अड्डा, सुरक्षा केन्द्र । 
भारत माता का विशाल उद्यान बन गया - 
आतंक, स्कैम, घोटालों का नन्दन-कानन 
जहां स्नेहिल मलय पवन का आनन्द ले रहे, 
देश के धनपति, प्रहरी नेता 
और जनमानस उनका अनमत अनुगत । 

चन्द्रशेकर की दिवंगत आत्मा 
उन पर अट्टहास करती, उन्हें धिक्कार रही - 
भारतमाता के सपूतो !
बेच दो, राष्ट्र को, उसकी बची-खुशी मिट्टी को ;
शहीद के प्रति सच्ची अनुपम श्रद्धांजलि, 
यही होगा, तुम्हारा महत्तम बलिदान, 
सर्वोत्तम अवदान । 
तुम्हारी यशःकीर्ति का जीवन्त साक्ष्य !
कहीं देर न हो जाय ! ! 

                     -नियति निसर्ग 

महाव्रत 


कुन्ती पुत्र, आदेश दें !
ले लूं प्रतिशोध, यही है अवसर ।

सोम ! यह क्या कहा ? 
घोर अन्याय, जघन्य अपराध । 
चला जा, यहां से तू, 
भले मेरा मित्र है और कहीं सुचिन्तक भी ; 
ऐसा न होने दूंगा ; कुरु की मर्यादा की 
सदा करूं रक्षा, यही मेरा व्रत । 

सारे मेरे पूर्व पुरुष कितने पुराण पुरुष 
खड़े आकाश में देखने को उत्सुक 
मेरा कौशल रण । 

अर्जुन से पराजित हो, 
हूंगा गर्वान्वित पर, तुक्ष सर्प की लूंगा न सहायता 
विकट रणभूमि में लोक वेद च्युत हो 
युद्ध मर्यादा का हनन न होने दूंगा । 

आज मेरे भाग्य का और कहीं परीक्षा का 
सौरज प्रदर्शन का आया सुअवसर 
स्वर्णिम अवसर हाथ से न जाने दूंगा 
मैं सूर्य पुत्र, आज उसे साक्षी मान, 
उतरूं रणक्षेत्र में । 

एक क्या शतार्जुन भी टिकें न समक्ष मेरे, 
दिखा दूं शूरवीरों को, 
कल, छल, नीति-नय छोड़ सारे अपमार्ग
मेरे बल सौरज से पराजित किरीटी हो, 
यही मेरी साध, सवितृ-मंडल को प्रणाम, 
अक्षत ऊर्जा को नमन !

                     -नियति निसर्ग 

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012


मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 


वसुधा कितनी अनुशासित है, ग्रहपिण्ड हैं कितने कालनिष्ठ 
सारे पर्वत, सारी नदियां, सारे पशु-पक्षी ऊष्माणु, 
योद्धा-प्रचण्ड ये शक्तिमान, मानव-अतिमानव, ये दानव, 
सारे पथदर्शक, प्रतिहारी, मंत्री, शासक, नेता सारे, 
सारे खरशर, ये सव्यसाद, सारे पुण्यात्मा, ये पापी, 
ऋषिवर, मनीष ये विज्ञानी, सारे संगीत-कला पण्डित, 
ये चिदाकाश सौन्दर्यवाह, किसकी इंगिति पर चलते हैं, 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मै कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

यह किस अदृश्य की लीला है, जो काल-नियति की क्रीड़ा है, 

बस वायु बना, जिसका खम्भा, यह बेतारों की वीणा है । 
कितना असीम इसका पौरुष, कितना विशाल इसका वैभव, 
मिट्टी का कह लो, तुमा इसको, सोने का दाम लगा डालो, 
हीरे की इसकी माप-तौल, मोती के हाट चला डालो, 
यह मोल कहीं, बेमोल कहीं, मिट्टी के मोल न बिकता है, 
यह उस अनन्त की लीला की, कैसी अद्भुत, संरचना है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?  

यह किस अनन्त की लीला है, जो बिन कागद के चित्रित है, 

अनगिन रंगों से मज्जित है, बहु अनुभावों से पूरित है । 
अनगिन साजों से शोभित है, मर्यादाओं से पालित है । 
इसकी गति थिरक हिला देती, तड़-तड़ित् वायु-वर्षा देती, 
सारी वसुधा को सींच-सींच, श्यामल कण-शस्य भरा देती, 
घन-वायु दिशा दिखला देती, वसुधा जीवन्त बना देती । 
ब्रह्माण्ड बना, जिसका कारण, वह किस विभुता का स्पन्दन है ? 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

वह सुषमा-सी सौन्दर्य नटी, मधु-सुधा लिए है, कहां खड़ी, 

पग की पायल की छाम-छूम से, मन के घुंघरू बजा रही । 
जब मस्ती और थिरकती है, पलकें भीगी-सी हो जातीं । 
नर्तन उसका क्या मचल-मचल, स्वर्गिक स्वर लहरी लाता है । 
जब नभ के बादल भेद-भेद, अपना परिचय दे जाते हैं  ; 
जब सरगम से बनकर मन में, हृद्तंत्री तार जुड़ाते हैं । 
उन सप्तस्वरों की थिरकन में, कितनी मादकता आ जाती ? 
यह कौन बताये, क्या जानूं  ;  मै कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

मादक वसन्त जब आता है, मन की उमंग बन जाता है  ; 

तब तरुवर मुकुट लगाते हैं, पौधों को शिखी बनाते हैं, 
कोयल जब कूक लगाती है, पंचम-स्वर में कुछ गाती है, 
मधु के सौरभ में झूम-झूम, कितने अलि-सुत बौराते हैं . 
प्रिय के चिन्तन में हो विह्वल, प्रेयसि कुछ बोल न पाती है
होठों की भाषा मौन बनी, आंखों से ढलती जाती है । 
सौन्दर्य घनत्व अकविता की, क्या गहराई-ऊंचाई है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं  ;  मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

निर्माण मनोहर होता है, चित्रण होता, कितना सजीव ;

संगीतों की स्वर-लहरी में, जब जाता है, सब जगत डूब । 
वह तभी जगाकर सब जग को, लोकित आनन्दित करता है ;
फिर, आशा और निराशा के मिस, गुन-गुन-गुन कुछ गुनता है । 
सोचता, बहुत कुछ, है, मन में, पर, पाता है, नामांश कहां ? 
जो हाथ नहीं कर पाते हैं, वह मन सब कुछ कर जाता है ;
फिर, मानव की चिति-प्रज्ञा की, कैसी चेतनता क्या जानूं ? 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

महाप्रलय जब आता है, वह अपना त्रास दिखाता है । 

तब कालपुरुष का रोष सभी को, एक-एक चट जाता है । 
सब खड़े-खड़े रह जाते हैं, बस, पड़े-पड़े रह जाते हैं । 
क्या जीव-जन्तु, जंगम-स्थावर, सब कालमुखी हो जाते हैं । 
फिर, पुरुष-प्रकृति हो एक तत्त्व, वसुधा जलमय हो जाती है । 
मनु भी न कभी बच पाता है, विभु की विभुता मिट जाती है ;
फिर काव्य कहां, लेखनी कहां, कैसा विधान, परिवर्तन है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

यह सृष्टि जगत का शाश्वत क्रम, अपना करतब दिखला जाती । 

उस जल प्लावन को सिमटाकर, बहु जीव-जन्तु उपजा जाती । 
जब पुरुष-प्रकृति के बीजरूप, शतरूपा-मनु आ जाते हैं ; 
तब मानव की प्रतिमाओं से, वसुधा के घऱ भर जाते हैं । 
चरैवेति समवेत स्वरों से, जब वह अलख जगाता है ।
गीता का संदेश गूंजकर, वसुधा पर छा जाता है । 
इस पंचभूत निर्मित जग की, कितनी स्थायी चेतनता है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

                      -नियति निक्षेप 

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012


मैं कवि हूं ; पर, कविता नहीं लिखता !


भूमिका प्रारम्भ होते ही मन ने प्रश्न किया -
यह कैसा चक्रवात ? 
सूर्य अपनी किरणों से ऊष्मा की ऊर्जा न बिखेरे, 
मेघ वृष्टि से विरमित हो जाय, 
वृक्ष फलदान की क्रिया से विश्राम ले ले, 
वसुन्धरा अपना धैर्य छोड़ दे । 
यह सब क्या हो रहा ? 

प्रत्येक स्थावर-जंगम का अपना धर्म होता है ; 
फिर मैं, कि प्रेरणा मिली- सावधान ! 
तुम कवि हो ; पर, कविता न लिखना ।
कारण, कविता कठोर सत्य है ;
जिसकी आंच बड़ी तीव्र होती है । 
उसे तुम सह न पाओगे । 
तब सत्य का अनादर होगा । 
दोहरे व्यक्तित्व का चित्रण करोगे ;
क्योंकि, एकनिष्ठ व्यक्तित्व खोजने पर भी न मिलेगा । 
अनुशासन से दूर होते जाओगे ;
क्योंकि, शासन की बागडोर ढीली पड़ गई । 
आचार-संहिता के अभाव में फंसोगे ; 
क्योंकि, वह शब्दकोश का विषय से गया । 
समदृष्टि और वास्तविकता, वणिक्वृत्ति में समा गयीं । 

भारतीय भारत और राष्ट्रीय राष्ट्र 
धर्म-निरपेक्षता की भेंट चढ़ गए । 
भ्रष्टाचार एवं देश की भ्रष्ट राजनीति ने व्यष्टि-समष्टि
एवं देश को कहीं का न छोड़ा । 
आज जनतंत्र का अभिमन्यु विषमताओं के 
व्यूह में चीत्कार कर रहा, 
पर, किसी को कान करने का अवकाश नहीं । 

इसीलिए तो कह रहा हूं - बुद्धि की महामारी में 
तुम्हारी कविता की डोंगी हताश होने लगेगी, 
जबकि, कविता की जहाजरानी प्रशान्त से नियागरा में 
सीना ताने निर्भय-निःशंक तिरती है । 
मानसिकता के अभाव में जनमानस को उपदेश देना 
बन्दर को तलवार सौंपना होगा । 

इसीलिए, तो..... पर, कविता एक कला है । 
मनोरंजन का साधन, उसका पर्य्याय ; 
वह मन को हंसाती-सरसाती, लोक-परलोक दर्शाती । 
मानस का श्रृंगार कर मलिनता के भ्रम को भगाती । 
खिन्नता की काई काटती और 
हंसाते-हंसाते आंखों को सरसा देती है । 

फिर, सोचता हूं - कविता जीवन है - 
जो व्यक्ति को जीना सिखाती है । 
सिखाती, अनुशासन, 
कराती कर्म, चराती धर्म, निराती न्याय
और देती लोक-परलोक, स्वर्ग-मर्त्य, मुक्ति-निर्वाण । 
यह है, सेतु, महासेतु 
जिससे जीव इहलोक से परलोक का मार्ग उकेरता । 
जगत-प्रवाह चला जा रहा है, चलता जाएगा, 
अज्ञात की ओर, चिति के परे । 

कविता है -
जीवन में साहसियता की उमंग-तरंग 
जिसने बनाया, व्यक्ति को भगीरथ, 
टाटा स्टील में नहीं, 
प्रकृति के प्रेरणा-जनित कारखाने में, 
सशक्त कर्म-ज्ञानेन्द्रियों 
और दो हजार करोड़ कोशिकाओं के 
कम्प्यूटर मस्तिष्क सहित, 
जिसके मार्ग में कभी दिक्शूल न आया । 
कविता की प्रेरणा ने बर्बरता के विरोध में 
हाथ उठाकर शपथ दिलाई -
आततायियों को ध्वस्त करना होगा, अपरिहार्य । 

कविता किसी रस-विशेष में निःसृत होती, 
जो पेय नहीं, पेप्सी नहीं, और कुछ 
जो मुरझाए मन को हरा करती है । 
यह है, सभी रोगों की अचूक महौषधि ;
प्रेमी-प्रमिका के हताश-निराश मनों में 
करती, आशा के संचार । 
कविता समय से अपने रंग बदला करती ;
पर, यह सरीसृप नहीं । 
पुष्प से कोमल, वज्र से कठोर, 
आत्म-समर्पण, आत्म निवेदन, प्रतत्ति अथवा और कुछ । 

कविता ने विश्वात्मा को निःशस्त्र करा 
घोर युद्ध की दी, प्रेरणा । 
असंख्य आततायियों के पतन से कांप उठी वसुन्धरा । 
कितने सिन्दूर धुल गये, कितने गोद हो गये, सूने, 
तब कहीं न्याय और धर्म बचे । 
फिर, कर्मठ संन्यासी ने संभाला, शासन-भार, 
कारण, स्वर्ग में था, सब कुछ अप्राप्य, अकरणीय, 
कर्म का सर्वथा अभाव । 

कविता है -
वाग्देवी की अधिष्ठात्री सरस्वती ;
जो लजाती, लक्ष्मी को और बोलती सबके सिर चढ़कर । 
कविता ब्रह्म है, जिससे आविर्भूत हैं, 
समस्त सृष्टि के विकासक्रम जो अनन्त हैं, अनादि हैं, 
अकथ और बुद्धि के परे हैं । 
कविता की परिभाषा पूछिए - 
व्यास, पराशर, नारद से ; भवभूति, कालिदास से  ;
सूर और तुलसी से । 

कविता है -
जगत का कारण, समस्त सृष्टि का स्पन्दन, 
जड़-चेतन की शाश्वत अनुभूति, 
उनकी सनातन अभिव्यक्ति । 
अवसाद-सहचरी, आह्लाद-सुरमिता,
सुख-दुःख-सिद्ध रसायन, अमृत संजीवनी, 
ऐहिक, पारमार्थिक सिद्धि । 
कविता माया प्रकृत्ति है, जीव है, ब्रह्म है, 
पृथ्वी, सूर्य, वायु और आकाश है । 
वह शरीर है, आत्मा है, प्राण है । 
मंत्र में प्राण फूंकनेवाला बीजमंत्र है । 
कविता पयस्विनी गंगा है, 
जो पंचभूत के स्फुरण से चेतना में हुंकार भरती है । 

कविता है - 
भाव या अभावगत, 
लोक-परलोकगत, आत्म-परमात्मगत ;
बोध की पराश्रित, विवेक परिमार्जित, 
प्रसूत विवेक, सर्वथा कल्याणकर, 
अवधि-अबाधित, कालजयी, आर्ष-लोक-वेद-विद्ध,
बुद्धि-विवेक की परिधि के परे, सर्वव्याप्त, निरवधि, 
सोsहं से हंसो तक पहुंचानेवाली, 
जिसकी अजस्त्र गरिमा से सृष्टि का 
अणु-अणु, कण-कण मुखर है । 
इसीसे, कहने के लिए बाध्य हूं -
मैं कवि हूं ; पर, कविता नहीं लिखता !

                                 -नियति निक्षेप 

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012


तितीर्षा


भाव की प्रत्यंच धर
कार्मुक सजीला कर्म का
ज्ञान का शर सिद्ध हो
अनिरुद्ध हो पथ व्यक्ति का । 

डूब जाएँ सिन्धु में
सागर-महासागर सभी
पर तितीर्षा लोक जीवन की
शमित होगी नहीं । 

डांड़ छूटे, नाव डूबे
पर कभी डूबा न दुर्बल
बाहु का पतवार हो
पतवार का हो बाहु सम्बल । 

          -नियति न्यास 

रविवार, 21 अक्टूबर 2012


दर्पण


 -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

जहां कहीं भी आप खड़े हों
चाहे हिमगिरि या घाटी ।
सिंहासन विक्रम के बैठे
अथवा बैठे हों माटी ।।

कहीं बैठ नन्दन कानन में
भरते हों छवि की मुस्कान ।
युद्धक्षेत्र में डटकर पैनी
हों निकालते, अपनी म्यान ।।

कहीं आपकी परिभाषा को
कोई न दे पाएगा ।
कहां आप क्या किए जा रहे
दर्पण ही बतलाएगा ।।

  -नियति निसर्ग

उपेक्षित


मैं नागरिक भारत का
धन-सम्पदा-परित्यक्त
भू-संपत्ति अपहृत
अधिकार प्रवंचित
चिर प्रवासी
किसान से मजदूर
विधुर विपन्न । 

जगन्नियन्ता नारायण !
कितने करुण,
कैसे बने थे दीनानाथ
अवढरदानी !
पर भूमिगत लक्ष्मी के
प्रयाण ने
तुम्हें भी अधिकार विहीन
कर दिया, 
वरन कृपानाथ के रहते
मेरी दुर्गति न होती । 

          -नियति न्यास 
तितीर्षा

भाव की प्रत्यंच धर
कार्मुक सजीला कर्म का
ज्ञान का शर सिद्ध हो
अनिरुद्ध हो पथ व्यक्ति का ।

डूब जाएँ सिन्धु में
सागर-महासागर सभी
पर तितीर्षा लोक जीवन की
शमित होगी नहीं ।

डांड़ छूटे, नाव डूबे
पर कभी डूबा न दुर्बल
बाहु का पतवार हो
पतवार का हो बाहु सम्बल ।

          -नियति न्यास


प्रगति पंथ 

 -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

जगत सदा सुनने को प्रस्तुत
रहता है, आदेश ।
कहीं आपमें क्षमता ऐसी
दे सकते, निर्देश ।।

जन केवल दो में विभक्त हैं
अच्छे, बुरे नहीं होते ।
एक सदा पथदर्शक होते
अन्य कहीं पीछे चलते ।।

यही विश्व के क्रम में चलता
आगे बढ़ जाने की चाह ।
संयम कहीं दिखाता उनको
बस, चलने की सच्ची राह ।।

                 -नियति निसर्ग

आत्मविश्वास 


   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

खोया हो विश्वास आपने
सभी जनों का अपने आप ।
घोर तमिस्त्रा में भी रख लें,
कैसे मुक्ति मिले अभिशाप ।।

लांछित कितने हुए विश्व में
राम, कृष्ण से रामानुज ।
सत्पथ मर्यादा की रक्षा
त्याग आसुरी वृत्ति मनुज ।।

सत्य न्यास पर चल कर तुम
अपने कर्त्तव्य निभाओगे ।
देश बनेगा, स्वर्ग कहीं
जिसको तुम सोच न पाओगे ।।

              -नियति निसर्ग

नियति चक्र 


   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

कहीं कभी पर्वत चढ़ना हो
या उड़ जाना हो आकाश ।
मन के पैरों चढ़कर देखो
मन विमान से हो न हताशा ।।

तब तुम चलो शिखर छूने को
मार्ग जटिल हो पथ में शूल ।
वायुयान पर चढ़ो कुहासों
मध्य कहीं कितना हो तूल ।।

मन का रथ सारथी बने
जब वह तुमको ले जाएगा ।
कहीं शिखर या अन्तरिक्ष भी
चरणों में झुक जाएगा ।।

                -नियति निसर्ग

नियति चक्र 


   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

कहीं कभी पर्वत चढ़ना हो
या उड़ जाना हो आकाश ।
मन के पैरों चढ़कर देखो
मन विमान से हो न हताशा ।।

तब तुम चलो शिखर छूने को
मार्ग जटिल हो पथ में शूल ।
वायुयान पर चढ़ो कुहासों
मध्य कहीं कितना हो तूल ।।

मन का रथ सारथी बने
जब वह तुमको ले जाएगा ।
कहीं शिखर या अन्तरिक्ष भी
चरणों में झुक जाएगा ।।
      -नियति निसर्ग

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 


         -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

हे जनमानस के भारतेन्दु !
हिन्दी-भाषा के सूत्रधार ।
तदभव भाषा, क्या मुहावरे,
कहावतों में फूट रहे, प्राणों के स्वर,
गद्य फूंकते प्राण, पूर्वी ब्रज के पुट,
निखर उठता स्वरूप।

पुरातत्त्व, साहित्य और इतिहास कला में,
सदा निरुपित तथ्य और वे भाववेग ।
कविता, नाटक अथवा निबन्ध
जीवन चरित्र हो, उपन्यास
सबमें युगबोध, प्रवर्तन, रूप युक्त -
कवि वचन सुधा और चन्द्र चन्द्रिका
नारी प्रबोधिनी ।

राष्ट्र प्रेम-प्रतिमूर्त्ति, भक्ति के मानक कवि,
युग-संस्थापक, जनक हिन्दी भाषा के ।
ये संचित अवदान तुम्हारे,
पथदर्शक जन-जन के ।
हे जनमानस के भारतेन्दू !
हिन्दी भाषा के सूत्रधार ।।
शत-शत प्रणाम ।

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012


तीर्थस्थल 

   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

हो अभिशप्त पहुंच पाया मैं, सोमनाथ शिव सिर के ताज ।
जिनकी मर्यादा लूटी थी, बार अनेकों ग़ज़नी राज ।।

मर्माहत हो चला वहां से, गोदावरी गंगा तीर ।
सूपनखा सोई वर्षों से, नकटी बन उन लक्ष्मण धीर ।।

मार्ग अनेकों देव-देवता, से बोझिल था, पूरा देश ।
भक्ति द्राविड़ी की महिमा थी, शैव, वैष्णवों के वे वेश ।।

तिरुपति बालाजी का मंदिर, भक्त-जनों की भीड़ अपार ।
भरी प्रणामी पूर्ण आरती, आर्तजनों का पारावार ।।

कहीं छोड़ आया था पीछे, शिरडी के वे साईराम ।
भक्तजनों की भीड़ देखकर, बढ़ा भक्ति का भक्ति-ललाम ।।

आगे मिले, सत्य साईं जो, अंतर टूटा भेद-अभेद ।
संत-भक्त के भेद मिटाएं, देवतुल्य वे विग्रह भेद ।।


अवदान 

   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

प्राणि-जगत को जल देता हूं, पशु-पक्षी तमचर, निशिचर ।
फूलों पर जलकण दे जाता, उनको दे, खुशियों से भर ।।

कहीं बरस खेतों को भरता, कहीं क्यारियां सुकुमारी ।
कहीं बगीचे का माली बन, खो देता सुधियां सारी ।।

ऊंचाई पर बर्फ बनाकर, ऋषि, मनीष दिखला देता ।
कहीं शिलाओं पर पड़कर, बहु ऋषि पत्नियां ला देता ।।

फैले मैदानों को देता, गंगाजल का अनुपम दान ।
इसके बदले में पाता मैं, अन्न-राशि का जो अवदान ।।

झंझा से मैं झड़ी लगाता, गिरि, पुष्पों और पत्रों पर ।
मोती कण को निरख-परख, विस्मित होता, उनके ऊपर ।।

दूर बढ़ा, इतना समुद्र में, भूल गया, मैं अपनी राह ।
पर, सीपों में मोती बनकर, पूरी कर दी, उनकी चाह ।।


धर्म बनाम संप्रदाय 

            -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

धर्म सदा जो धारण करता, कहीं कर्म की राह ।
सत्य, अहिंसा, प्रेम सिखाता, और नम्रता चाह ।।

कोई मत या धर्म कहीं है, ईश्वर का सिद्धांत नहीं ।
वह तो है, अध्यात्म चेतना, आत्म-विकास, प्रकाश कहीं ।।

धर्म जोड़ता, व्यक्ति को, सदाचार सिखलाता ।
सदा सुपथ सत्कर्म का, मार्ग कहीं दिखलाता ।।

धर्म भिन्न है, संप्रदाय से, यह जन समझ न पाया ।
संप्रदाय के घेरे में, बंधकर वह जीता आया ।।

धर्म जोड़ता, प्राणि-जगत को, संप्रदाय मति तोड़ ।
यही द्वेष का कारण बनता, कौन लगाए, होड़ ।।

होता, धर्म उदार है, संप्रदाय संकीर्ण ।
धर्म सदा अमृत सदृश, संप्रदाय विष जीर्ण ।।

धर्म ग्राह्य आचरण योग्य है, इसके हैं, आचार विशुद्ध ।
संप्रदाय है, प्रश्न चिह्न बन, जीता कितना शुद्ध ।।

संप्रदाय जो आदर करता, सबका सदा समान ।
वह सबसे आदर पाता है, सार्वभौम बन जान ।।

जब वह दुर्लभ सदविवेक से, अपने को पहचाने ।
सबसे प्रति उदार बनकर, वह आत्म सदृश जग जाने ।।

संप्रदाय आचार-संहिता, कहीं नहीं टकराए ।
फिर उसके मन शान्ति हो, और समृद्ध बन जाए ।।

संप्रदाय या विश्वयुद्ध के, कलह सभी सर जाएं ।
सभी मनोरथ पूर्ण हों, शान्ति, प्रेम सरसाएं ।।


कर्तव्य बोध 

                   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

श्रमिक के श्रम सीकर
बिखरेते रहें, अनुक्षण।
असकी आत्मा की सुगन्ध,
रयि के सोमतत्व।

शीत की शीतता में
संगर्षरत कृषक
करता रहे, दिन-दिन ।
लहलहाती फसलों की
हरीतिमा में स्नेहित स्नान ।

अध्यापक,
अपने जन्म-जन्मांतर के
सारे संचित पुण्य,
संजो दे, निष्काम ;
शिष्य की झोली में ।

वैज्ञानिक बिखेर दे,
अपने बुद्धि के वैभव,
क्रमिक विकास यात्रा में,
सृष्टि की सुरक्षा में ।

रचनाकार रच दे,
अपनी आत्मा के संस्पर्श से,
युवक्रांति के माध्यम से,
एक नया इतिहास ;
फूट पड़ें, नव्यता के गान ।

नेता अपने श्वेत परिधान में
बो जाए, आशा के बीज,
दे जाए, भोजन, वस्त्र, आवास,
शिक्षा, संस्कार, व्यापक
युवक्रान्ति।

अभिनेता अपने रंगमंच से
बांट जाए, असीम मुस्कान
डुबो जाए, अवसाद,
प्रशान्त की गहराई में ।

चिर आह्लाद के आंसू
धो डालें, समस्त क्लेद-विषाद ;
रचाएं, एक नया इतिहास,
अजेय युवक्रान्ति
का, कुलाधिपति राष्ट्र का ।

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

                                  


 मां शारदे !

   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय








जननी है, तू वेद की, वीणा, पुस्तक हाथ ।
करुणार्द्र तेरे नयन, जन मानस की माथ ।।
सर्व व्याप्त निरवधि रही, शुभ्र वस्त्र संपृक्त ।
सदा निनादित नेह से, स्त्रोत पयस्विनि सिक्त ।।
विश्व पटल पर है इला, अंतरिक्ष में ख्यात ।
कहीं भारती स्वर्ग में, ब्रह्मलोक प्रख्यात ।।
जहां स्वर्ग में सूर्य है, वहीं मर्त्य सुविवेक ।
अन्तर्मन चेतन करे, यह तेरी गति नेक ।।
 ऋद्धि-सिद्धि है जगत में, ज्ञान यज्ञ जप-जाप ।
अभयदान दे, जगत को, हर ले सब परिताप ।।
तू देवी अभिव्यक्ति की, जग है, तेरा दास ।
 सुख-सम्पत्ति से पूर्ण कर, हर ले, सब संत्रास ।।

                                                                                         -नियति निसर्ग से. 

           कलकत्ता की काली

                     -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय


काली, कलकत्ता की महिमा, वर्षों का यह अद्भुत नाम ।
मन से माता की पुकार की, पूर्ण मनोरथ, मंगल काम ।।
कोई भक्त निराश न लौटा, माता का उद्भुत वरदान ।
सबकी झोली उसने भर दी, बंगभूमि का यह अवदान ।। 
समय शिला के कालचक्र, धारण करतीं, काली माता । 
इसीलिए, शिवशक्ति विराजित, अशरण शरण नाम ख्याता ।।
माता आत्मोत्सर्ग चाहतीं, आत्मत्याग, सत्कर्म महान । 
दीन-दलित के आंसू पोंछे, ऐसी बलि पर टिकता, ध्यान ।। 
अन्य जीव, पशुबलि से होगा, कभी न माता का श्रृंगार । 
मां को करुणा, स्नेह चाहिए, माया, ममता की आगार ।। 
राजा से हैं, रंक भागते, माता के दर्शन को । 
मलिन, दीन, हीन, आतुर, लुंचित, मुंचित लंगर को ।। 
भैरव के भक्तों का मेला, लगता, माता के दरबार । 
मां की करुणा दीन जनों पर दर्शन चाहे, बारंबार ।। 

                                                      -नियति निसर्ग से. 

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

                         वाराणसी के विश्वनाथ 

                                                        -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

संगम वरुणा, असी बताता, नगरी शिवशंकर अभिराम ।
स्वर्गंगा में स्नान, ध्यान कर, पाया, विष्णु चरण-फल काम ।।
पहुंचा, विश्वनाथ दर्शन को भक्तों की थी, भीड़ अपार ।
घंटा, शंख विविध वादन से, कभी न पा सकते थे, पार ।।
सजी आरती क्या शंकर की, शंकरमय था, जन-समुदाय ।
कीर्तन-भजन, गीत, पुष्पांजलि, से मज्जित था, मित या दाय ।।
शंकर के दर्शन कर देखे, कितनी घाटों की नगरी ।
नन्दी से वे काम धेनुएं राजमार्ग पर थीं, पसरी ।।
क्या संकटमोचन की महिमा, आर्तजनों के मंत्रोच्चार ।
हव्य, हवन, आरती बताती, कैसे वे षोडश उपचार ।।
विद्यामंदिर में शिव देखा, उनका धवल धार अभिषेक ।
क्या अनुरक्ति, प्रपत्ति, भक्ति थी, जय-जय-जय, शिव, शम्भु महेश ।।
                                                                             -नियति निसर्ग

आत्मतत्त्व
  -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय
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व्यक्ति स्वयं में पूर्ण जन्मता, वह अपूर्ण बन जाता है ।
कस्तूरी मृग बना भटकता, नहीं कहीं कुछ पाता है ।।
शैशव सुखी खिलौने पाकर, बाल्यकाल क्रीड़ा अनुरक्त ।
सज्जा में कौमार्य निरत है, यौवन विषय-भोग आसक्त ।।
वयःसंधि में पाने का सुख, और थोड़ी जीने की चाह ।
चला जा रहा व्यक्ति स्वयं वह, पा जाने को अपनी राह ।।
छोटी एक सफलता बनती, असफलता पर सेतु ।
वहां वयक्ति सागर तिर जाता, निज आस्था के हेतु ।।
-नियति निक्षेप

नयी सदी पर  

    -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय
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उठे, विश्व उत्थान श्रृंग पर, हाथों लिए विविध उद्योग ।
कम्प्यूटर, जैविक-संरचना, चाहे हों, कितने प्रौद्योग ।।
ऊर्जाएं बन, प्राण रक्षिका, समता के वैभव उपजाएं ।
जग से कटुता, वैर मिटें और शांति प्रेम सरसाएं ।।
कोई कहीं न भूखा होए, न ही कहीं कोई बेराह ।
छोटे-बड़े सुखी सब होएं, सभी चलें, बस अपनी राह ।।
ऐसे ही हम समझ-बूझ से, काज करें, निज सारे तोल ।
श्रम से अपना नाता जोड़ें, नयी सदी का सच्चा मोल।।
                              -(नियति निक्षेप)

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012


 कुण्ठा




अस्पताल के पीछे                                                                    
दो दीवारों के बीच
पक्के धरातल पर
कूड़े के ढेर से झाँक रहे
कुछ हरी बोतल के टुकड़े
आधे युग की कमाई
जिस पर आम के अमोले,
बेहाया और इमली
काट रहे जेल की सजा
कुकुरमुत्तों के मध्य
यही जीवन-क्रंदन.

कैसे जीता हूँ !


कोई पूछे, उसे बता दूँ, कैसे जीता हूँ।
जीवन की दुखियारी चादर, कैसे सीता हूँ।

सूखा कहीं पनप उठता, मुरझाया भी हरियाता।
लू के गरम थपेड़े खाकर, झड़ियों से लहराता।

फूल कहीं महकाता, मन को, कलिका आस बँधाती।
समझ न पाया, अब तक भी जग, नियति कहाँ ले जाती।

कैसे, पनप रही, हरियाली, क्‍या थपेड़ क्‍या झड़ियाँ।
कैसी महक कहाँ वह आशा, क्‍या उम्‍मीद की लड़ियाँ।

दु:ख में बीत गये, दिन सारे, आँखें रोती जातीं।
दिन-दिन मोती ही बरसाकर, अपनी व्‍यथा सुनातीं।

कोई पूछे, उसे बता दूँ, कैसे जीता हूँ ।
जीवन की दुखियारी चादर, कैसे सीता हूँ।

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012



कविता: सिद्धि -श्यामलाल उपाध्याय


पूना का रेजिमेंट 

जिसमें कथा की 

पूर्णाहुति.

व्यास महाराज को

यथाशक्ति दान-दक्षिणा,

इसे बीच श्वेत 

अधिकारी का प्रवेश 

श्रद्धावनत विनयभाव

व्यास की अनुमति से

जिज्ञासा जनित एक प्रश्न-

मात्र स्थानान्तरण का.



व्यास कथा-वाचक का

मौन मूक चिंतन और 

श्वास पर आधारित 

लग्न-वेला-मेलापक पर

शांत सस्वर उत्तर-

कार्य-सिद्धि 

मात्र सप्ताह में-

अंतिम निर्णय.



श्वेत अधिकारी का 

कमीशंड अधिकारी को

इंगिति-

व्यास की व्यस्था और

श्वेत अधिकारी का

साभार प्रस्थान.

व्यास के मस्तिष्क में 

विचारों के आरोह-अवरोह

जीवन संकट-ग्रस्त प्रभो!

धारित अवधि में यदि

कार्य-सिद्धि न हुई-

मात्र एक प्रश्न से आक्रांत,

पर वेला में आहुति के

कोई भी वचन मृषा 

होता भी तो कैसे/

फिर भी यदि साधना

हुई न साकार.


जागा विवेक

सुन उद्घोष अंतर का

चित्त एकाग्र और

वालिश वृत्ति त्यागकर

ध्यान कर दुर्गा का.



व्यास ने संध्या को

ग्रहण किया आसान

प्रतीची मुख ध्यान में

प्रारंभ किया जप को

प्रातः उठ प्राच्य मुख

न्यौछावर कर सर्वस्व

दुर्गा मातेश्वरी को

ध्यान किया ब्राम्हण ने 

एकनिष्ठ भाव से,

पर आशंका पिशाचिन की 

विकल करती व्यास को.

साधना में सिद्धि का

अभाव रहा किंचित

तो पथ-भ्रष्ट, पदच्युत 

प्रवंचना अनर्थ और

लोक-वेद च्युति

देव योग अथवा

एकाग्रता ने व्यास की 

द्वादश प्रहर अंतराल पहुँचाया

एक पत्र उस रेजिमेंट में.



श्वेत अधिकारी नाम-

रेजिमेंट का स्थानान्तरण 

मात्र चौबीस घंटों में

जर्मन-फ्रांस सीमा पार.

श्वेत अधिकारी

अपने सहायक को 

शीघ्र सावधान कर

चला पास ब्राम्हण के.

विनय-युक्त भाव से

टोपी उतारकर 

बोल उठा- महाराज!

आपने तपोबल से

कर दी मेरी कामना पूर्ण,

साधना की सिद्धि 

जो प्राप्त हुई मुझको.

श्वेत अधिकारी ने

विदा दी ब्राम्हण को

और मंत्रसिक्त जल से

संवेग मार्जन कर

व्यास ने तिलक दिया-

शुभास्ते पन्थानं .

भारत के मंत्र-तंत्र

अध्यात्म, साधनाबल

करते हठात आव्हान

निज ईश का

इनकी अनुरक्ति-भक्ति

होती इतनी प्रबल

कि देव वर्ग होता

बलात उनके वश में.

देखे मैंने कितने देश

घूमे देशांतर

पर ऐसा देश, ऐसा स्थान

मिला नहीं मुझको . 


देश का आकर्षण

और ममता इस देश की 

भूलता फिर कैसे?

यही मेरी अंतिम इच्छा 

पाऊँ अन्य जन्म यदि 

गाऊँ गीत ईश के 

बिकाकर हाथ दुर्गा के.

प्रस्तर-खण्ड                                                          
                                                                                                                                                                
हे काल दूत ! तुम शिला-खण्ड
निरवधि असीम भीषण प्रचण्ड
चिरकाल निरन्तर देवदूत
प्रसरित दिगन्त के जड़ अखण्ड
पाताल मूल धृत भूमंडल 
अम्बुधि आलोड़ित निर्भय बन ।
शरचण्ड मरुत के वायुवेग
झंझा झकोर धर
मेघ मालिका के खरशर सह
शान्तिदान से वृष्टि सुधा सम
कर अजस्र जल ।
सागर की उत्ताल ऊर्मि से
मर्दित घर्षित
जगती-विहास सागर-प्रलाप को
आत्मसात कर
सृष्टि नियति का ध्यान 
कराते कर्मठतावश । 
कहीं मेखला बन भू की
विकसित विशाल चट्टान सुदृढ़
जीवन-जल से, जीव-जन्तु से 
गुल्म-वृक्ष से, विविधौषध से 
करते तुम जग का पालन । 
जाग्रत सुषुप्त तुम बने एक 
तव एकाकी जीवन महान
करते तप-चर्या निशि-वासर
बन समय शिला के दूत काल । 
         -नियति न्यास 

अर्पिता


मेरे पति की दूरी मुझसे बहुत दूर
पर वे हैं मेरे पास निकट छाया से ।  
जीवन दोनों का प्रवासमय
मैं केरल की हूँ प्रवासिनी कलकत्ता में
वे केरल के पर प्रवास उनका सुदूर
अति मध्यपूर्व में । 

मन भर आता गद्-गद् होता
आँखें भरतीं, आँसू ढलते
स्नेह छलक कर मोती बनते
नहीं चाहिए ऐसे मोती
बहुरूपी बन करें प्रवंचित
अमित स्नेह-श्रद्धा से अर्पित
प्रेम हमारा जन्म-जन्म का
सदा सनातन । 

बदले जब भी जीर्ण कलेवर 
बानी रहूँ मैं सदा पुजारिन 
उनका मेरा जन्म-जन्म का 
साथ रहा है, और रहेगा
स्नेह और श्रद्धा से अर्पित,
सदा समर्पित ।
बनी रहूँ मैं सदा सुहागिन
सदा पुजारिन अपने पति की । 
                     
                              -नियति न्यास 

 नियति-न्यास
                                                                                            
जनन के व्यापार अगणित
क्यों मरण व्यापार ?
सान्ध्य सुषमा, अलख जीवन
हास प्रातः चिर अशाश्वत
जनन अगणित अन्त फिर-फिर
रक्त नीलम, अश्रु-छादन 
मरण के व्यापार
क्यों जनन व्यापार ?

कहाँ हैं वे प्राण-व्यान 
अपान और उदान
कह समान कहाँ रहे वे
राजहठ आक्रान्त ?
मलिन, दूषित, तृषित मन यों
पीड़, क्षुब्ध, मलीन
ऋषि-मनीष, महर्षि-योगी
भोग के ही सीम । 

देव-दानव गर्जना का
घोर हाहाकार
रक्त पात निपात मानव
निहत-आहत साथ 
नटीकृष्णा सुख-सुरभि से
लिए प्रत्याहार
दीन मानव शक्ति साधक 
बन सबल समुदाय ।

ले रही वह न्यास यों ही
नियति के उस पार
मन विषण्ण तृषित क्षुधित 
अधीर आठों याम । 
नित नवीन प्रबुद्ध मानव
कर सप्रीत विकास
हेतु मन की लालसा
पर मात्र केवल ह्रास ।

ऊर्ध्व गति का लास ले
मानव अनुक्षण धीर
बन रहा अनवरत साधक 
निष्ठ विपुल प्रकृष्ट । 
पर सदा बन कर पराजित
काल के यों हाथ
मृत्यु से कैसे बचे
निर्मुक्त हो निष्काम ।  
         -नियति न्यास 

युव सेनानी


शक्तिधर देश कोई
शत्रु बन दल-बल
युद्ध की भयानक 
विभीषिका ले उतरे । 
भूमि पर भयानक 
दुकाल आ पसर जाय  
अथवा विभीषक 
प्रदूषण रोग धमके ।

देश का अजस्र शक्ति 
धारित युव सेनानी
हाथ पर हाथ धरे 
बैठा रह जाएगा । 
निर्भय रण दुन्दुभी से 
वैरी दस्यु सम जान
अतुलित पराक्रम में 
शीघ्र जुट जाएगा । 

रुकने का नाम कभी
जान क्या सका है वह 
लड़कर वैरी से 
उसके छक्के 
छुडाएगा । 

छोड़ेगा अजस्र शक्ति का 
वह अमोघ अस्त्र 
भय से भयानक 
कपाली बन जाएगा । 
सारी शत्रु सेना का
दल-बल मान मर्दित कर
यश-ख्याति अर्जित
देश-भक्त कहलायेगा । 
किंचित दिशा में वह
असफल अपने को जान 
जीवित मृतक बन 
नाक न कटाएगा ।   

बनकर तूफ़ान मेघ
चिरचिरी की ज्वाला बन
सबको मिटाकर वह 
आप मिट जायेगा । 
अथवा स्वातंत्र्य वेदिका पर
प्राण अर्पित कर
देही बिन देह हो 
सदेह स्वर्ग जाएगा । 
         -नियति न्यास 

विज्ञान 

  
मैं हूँ, केवल मैं
भू लोक से अन्तरिक्ष तक
मात्र मेरा प्रसार
पद तल भूगोल
कर-तल आकाश
यश के गीत
मन के भाव
युद्ध और शान्ति
काल और क्रान्ति
अस्त्र-शस्त्र छद्मवेश
विविध ब्रह्मास्त्र 
अग्निशर प्रक्षेपक
शोणित का तर्पण
व्यथा विश्व की बढ़ाने को-
त्रास, भय, ह्रास
मुमूर्षा और विथकन ।

पर दृष्टि-भेद से 
ऋषि सा अवधूत
मेरी पताका कीर्ति
यत्र-तत्र-सर्वत्र
विविध तकनीकी प्राचुर्य-
अणु, ऊष्मा, औषध
प्रजनन, प्रत्यारोपण
भूगर्भ, अर्णव, अन्तरिक्ष
शिक्षा का माध्यम
गति-अनुगति का प्रेरक
केशर, गुलाब से
पुष्पित वसुधा तल
वायु के बिखरने को
सुरभि-प्रसार
यही मेरे रचना विधान । 

विश्व के नियामक
नए प्राण, नई स्फूर्ति
चेतना नव्य, कायाकल्प
भावगम्य, भव्य
अनादि पुरुष जर्जर
पर नव्य के
नूतन श्रृंगार से
वसुधा बसाने को
मैं हूँ, केवल मैं-
विज्ञान । 

अक्षरशः सत्य
विज्ञान देव 
और सुनें-
सुना उद्घोष स्वर
एक दिव्य वाणी का-
देवाधिदेव विज्ञान
सक्षम प्रशान्त-
बुद्धि के त्यौहार
देव लोक के चीत्कार,
क्षुब्ध खिन्न मलिन
और भय से भयातुर
हैं स्वर्ग के सम्राट । 
मात्र केवल एक प्रश्न-
आशंका आपतन की । 
यह क्या विज्ञान देव 
या कहें पिशाच देव 
कह लें धर्मराज या
यम कहें मन से । 

वृत्ति सात्विक शमित
घोर तामस के तमिस्र में
सब कुछ सर्वत्र रहा
आश्रित विज्ञान के ।
मानव की महान यात्रा
लोक चन्द्रलोक से
गतिमय मंगल की ओर । 

देव-दानव युद्ध में 
कल और छल ले
नय और नीति से
दानव विजित पर
मानव-देव युद्धरत 
घोर कलिकाल में । 

सारे देव वर्ग के 
रखे रह जाएंगे 
कौतुक अपार वे 
विजय होगी स्वप्न 
पर मानव से मुक्ति
नहीं देवों के वश में । 

नर-सुर संग्राम में
देवता पराजित हैं
अपराजेय मानव से । 
फलतः देव वर्ग आज
मानव का क्रीतदास
जीता सर्वहारा बन । 

मनु-संतानों की इंगिति पर
बना दारु योषित
फिर भी मन-वाणी से
भूरि-भूरि प्रस्तुत आशीष को । 
घोर रावणत्व ने
पोषित मनुजत्व से
कर दी समाप्त मर्यादा 
रामत्व की । 

मुहुर्मुहुर्अट्टहास-
निर्वासित त्रेता के राम
द्वापर राम निःशस्त्र 
कलकी राम काल के रहे
कल्पित उपेक्षित अज्ञात । 

गीता के सुघोष
मूक स्वर में
विज्ञान शमित
ऐसे सुने जाते
छोड़ धर्म-कर्म सारे
नीति-नय अस्त्र-शस्त्र
हो प्रपन्न कर ग्रहण 
प्रणत-पाल विज्ञान । 

पाप-पुण्य मुक्त हों
अहि से अहल्या 
पुष्प-वृष्टि हो रही 
दुंदुभि के उच्च स्वर
सरगम के माध्यम से
शंकर के डमरू से
मात्र ये विवेक श्रुत
स्वस्ति देव, स्वस्ति
तवास्तु विज्ञान देव !
कृष्णार्पण, कृष्णार्पण । 
             
              -नियति न्यास 

विवेक
                                                                                                  
मेरा परिचय-
मैं विवेक
पर मैं अब कहाँ 
चल में, न अचल में
न तल में, न अतल में
या रसातल पाताल में
मेरा आवास रहा
मानव के मन की
मात्र एक कोर में । 

मन, चित्त अहंकार की
साधना बन
सबको सचेतन की
अग्नि में तपाकर
स्फूर्त्त होता मुखर बन
वाणी के जोर से । 
मानव से उपेक्षित
परित्यक्त मैं रहता । 

कहाँ सूक्ष्म अभिजात्य
मेरा प्रवेश फिर कैसे
मनुज को मानव बनाए 
जब किरीट का कलि
परीक्षित से
मुक्तिबोध की
याचना करे ;
पर मनुज का परीक्षित
कुत्सित हो दम्भ साधे
मौन व्रत का
आह्वान करता मानव से । 

फिर मेरा आवास
क्या पूछ रहे-
मानव की कुण्ठा से
मैं चिर प्रवासी विवेक
गृह-स्कन्ध स्वर्ण के
पैरों तले कभी का
कुचला, अंतिम साँसें
लेने को मात्र
जीता रहा । 

मानव की जिजीविषा से
केवल सूक्ष्मता को
धारण किए वरन्
मैं नहीं, कहीं भी नहीं
सब कुछ है पर
मेरा सर्वस्व पारदर्शी
कहीं कुछ में नहीं
न होने को जिसे
तुम देख रहे हो-
वह है विज्ञान । 

अब कोई राम आए
विरति की सीता
और विवेक के जटायु को
दशमुख के-
दमन-चक्र से बचाए
जो दशरथ की
शुचिता की
पाखण्ड सृष्टि करता । 

सीता तो भूमिगत
श्रद्धा विश्वास जड़,
पर सहृदयता की
गरिमा का जटायु
छिन्न-पक्ष आहत
पड़ा मुक्ति के सुयोग की
प्रतीक्षा में, हे राम !
मैं तुम्हारा कृपा-भाजन 
विवेक । 
              -नियति न्यास