अवदान
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्यायप्राणि-जगत को जल देता हूं, पशु-पक्षी तमचर, निशिचर ।
फूलों पर जलकण दे जाता, उनको दे, खुशियों से भर ।।
कहीं बरस खेतों को भरता, कहीं क्यारियां सुकुमारी ।
कहीं बगीचे का माली बन, खो देता सुधियां सारी ।।
ऊंचाई पर बर्फ बनाकर, ऋषि, मनीष दिखला देता ।
कहीं शिलाओं पर पड़कर, बहु ऋषि पत्नियां ला देता ।।
फैले मैदानों को देता, गंगाजल का अनुपम दान ।
इसके बदले में पाता मैं, अन्न-राशि का जो अवदान ।।
झंझा से मैं झड़ी लगाता, गिरि, पुष्पों और पत्रों पर ।
मोती कण को निरख-परख, विस्मित होता, उनके ऊपर ।।
दूर बढ़ा, इतना समुद्र में, भूल गया, मैं अपनी राह ।
पर, सीपों में मोती बनकर, पूरी कर दी, उनकी चाह ।।
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