मैं सोचता हूं- कविता जीवन है / जो व्यक्ति को जीना सिखाती/ सिखाती अनुशासन, कराती कर्म/ चराती धर्म, निराती न्याय/ और देती, लोक-परलोक/ स्वर्ग-मर्त्य, मुक्ति-निर्वाण/
शनिवार, 13 अक्टूबर 2012
कुण्ठा
अस्पताल के पीछे
दो दीवारों के बीच
पक्के धरातल पर
कूड़े के ढेर से झाँक रहे
कुछ हरी बोतल के टुकड़े
आधे युग की कमाई
जिस पर आम के अमोले,
बेहाया और इमली
काट रहे जेल की सजा
कुकुरमुत्तों के मध्य
यही जीवन-क्रंदन.
श्रेश्त रचनायेँ. हार्दिक बधाइ.
जवाब देंहटाएंडा. रघुनाथ मिश्र्