उपेक्षित
मैं नागरिक भारत का
धन-सम्पदा-परित्यक्त
भू-संपत्ति अपहृत
अधिकार प्रवंचित
चिर प्रवासी
किसान से मजदूर
विधुर विपन्न ।
जगन्नियन्ता नारायण !
कितने करुण,
कैसे बने थे दीनानाथ
अवढरदानी !
पर भूमिगत लक्ष्मी के
प्रयाण ने
तुम्हें भी अधिकार विहीन
कर दिया,
वरन कृपानाथ के रहते
मेरी दुर्गति न होती ।
-नियति न्यास
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