मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012


अर्पिता


मेरे पति की दूरी मुझसे बहुत दूर
पर वे हैं मेरे पास निकट छाया से ।  
जीवन दोनों का प्रवासमय
मैं केरल की हूँ प्रवासिनी कलकत्ता में
वे केरल के पर प्रवास उनका सुदूर
अति मध्यपूर्व में । 

मन भर आता गद्-गद् होता
आँखें भरतीं, आँसू ढलते
स्नेह छलक कर मोती बनते
नहीं चाहिए ऐसे मोती
बहुरूपी बन करें प्रवंचित
अमित स्नेह-श्रद्धा से अर्पित
प्रेम हमारा जन्म-जन्म का
सदा सनातन । 

बदले जब भी जीर्ण कलेवर 
बानी रहूँ मैं सदा पुजारिन 
उनका मेरा जन्म-जन्म का 
साथ रहा है, और रहेगा
स्नेह और श्रद्धा से अर्पित,
सदा समर्पित ।
बनी रहूँ मैं सदा सुहागिन
सदा पुजारिन अपने पति की । 
                     
                              -नियति न्यास 

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