अर्पिता
मेरे पति की दूरी मुझसे बहुत दूर
पर वे हैं मेरे पास निकट छाया से ।
जीवन दोनों का प्रवासमय
मैं केरल की हूँ प्रवासिनी कलकत्ता में
वे केरल के पर प्रवास उनका सुदूर
अति मध्यपूर्व में ।
मन भर आता गद्-गद् होता
आँखें भरतीं, आँसू ढलते
स्नेह छलक कर मोती बनते
नहीं चाहिए ऐसे मोती
बहुरूपी बन करें प्रवंचित
अमित स्नेह-श्रद्धा से अर्पित
प्रेम हमारा जन्म-जन्म का
सदा सनातन ।
बदले जब भी जीर्ण कलेवर
बानी रहूँ मैं सदा पुजारिन
उनका मेरा जन्म-जन्म का
साथ रहा है, और रहेगा
स्नेह और श्रद्धा से अर्पित,
सदा समर्पित ।
बनी रहूँ मैं सदा सुहागिन
सदा पुजारिन अपने पति की ।
-नियति न्यास
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