उपक्रम
वर्णमाला से वृक्ष
शिशिर में सिमटे
हिम की मार से
और खर-शर-विद्ध पत्र
विदा ले रहे तरु से ।
भय से भयातुर वृक्ष
मौन ऋषि से खड़े
जानने को उत्सुक
और पाने को वर
खड़े खोल रहे शतमुख ।
मधु संचार से पा रहे
कोमल मसृण कोंपलें
वसन्त की, मत्त ग्रीष्म
ऊर्जा से ये पादप
पाने को जीवन्तता
नयी वसुधा बसाने को ।
बस यही क्रम
जो चलाता
इस जीवन को-
रजनी-दिवस, साँझ और प्रात
ग्रीष्म-वर्षा, शीत-वसन्त
अवसाद-आह्लाद
मृत्यु और जीवन ।
-नियति न्यास
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