प्रस्तर-खण्ड
हे काल दूत ! तुम शिला-खण्ड
निरवधि असीम भीषण प्रचण्ड
चिरकाल निरन्तर देवदूत
प्रसरित दिगन्त के जड़ अखण्ड
पाताल मूल धृत भूमंडल
अम्बुधि आलोड़ित निर्भय बन ।
शरचण्ड मरुत के वायुवेग
झंझा झकोर धर
मेघ मालिका के खरशर सह
शान्तिदान से वृष्टि सुधा सम
कर अजस्र जल ।
सागर की उत्ताल ऊर्मि से
मर्दित घर्षित
जगती-विहास सागर-प्रलाप को
आत्मसात कर
सृष्टि नियति का ध्यान
कराते कर्मठतावश ।
कहीं मेखला बन भू की
विकसित विशाल चट्टान सुदृढ़
जीवन-जल से, जीव-जन्तु से
गुल्म-वृक्ष से, विविधौषध से
करते तुम जग का पालन ।
जाग्रत सुषुप्त तुम बने एक
तव एकाकी जीवन महान
करते तप-चर्या निशि-वासर
बन समय शिला के दूत काल ।
-नियति न्यास
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