मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012


 नियति-न्यास
                                                                                            
जनन के व्यापार अगणित
क्यों मरण व्यापार ?
सान्ध्य सुषमा, अलख जीवन
हास प्रातः चिर अशाश्वत
जनन अगणित अन्त फिर-फिर
रक्त नीलम, अश्रु-छादन 
मरण के व्यापार
क्यों जनन व्यापार ?

कहाँ हैं वे प्राण-व्यान 
अपान और उदान
कह समान कहाँ रहे वे
राजहठ आक्रान्त ?
मलिन, दूषित, तृषित मन यों
पीड़, क्षुब्ध, मलीन
ऋषि-मनीष, महर्षि-योगी
भोग के ही सीम । 

देव-दानव गर्जना का
घोर हाहाकार
रक्त पात निपात मानव
निहत-आहत साथ 
नटीकृष्णा सुख-सुरभि से
लिए प्रत्याहार
दीन मानव शक्ति साधक 
बन सबल समुदाय ।

ले रही वह न्यास यों ही
नियति के उस पार
मन विषण्ण तृषित क्षुधित 
अधीर आठों याम । 
नित नवीन प्रबुद्ध मानव
कर सप्रीत विकास
हेतु मन की लालसा
पर मात्र केवल ह्रास ।

ऊर्ध्व गति का लास ले
मानव अनुक्षण धीर
बन रहा अनवरत साधक 
निष्ठ विपुल प्रकृष्ट । 
पर सदा बन कर पराजित
काल के यों हाथ
मृत्यु से कैसे बचे
निर्मुक्त हो निष्काम ।  
         -नियति न्यास 

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