तीर्थस्थल
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्यायहो अभिशप्त पहुंच पाया मैं, सोमनाथ शिव सिर के ताज ।
जिनकी मर्यादा लूटी थी, बार अनेकों ग़ज़नी राज ।।
मर्माहत हो चला वहां से, गोदावरी गंगा तीर ।
सूपनखा सोई वर्षों से, नकटी बन उन लक्ष्मण धीर ।।
मार्ग अनेकों देव-देवता, से बोझिल था, पूरा देश ।
भक्ति द्राविड़ी की महिमा थी, शैव, वैष्णवों के वे वेश ।।
तिरुपति बालाजी का मंदिर, भक्त-जनों की भीड़ अपार ।
भरी प्रणामी पूर्ण आरती, आर्तजनों का पारावार ।।
कहीं छोड़ आया था पीछे, शिरडी के वे साईराम ।
भक्तजनों की भीड़ देखकर, बढ़ा भक्ति का भक्ति-ललाम ।।
आगे मिले, सत्य साईं जो, अंतर टूटा भेद-अभेद ।
संत-भक्त के भेद मिटाएं, देवतुल्य वे विग्रह भेद ।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें