शनिवार, 20 अक्टूबर 2012


तीर्थस्थल 

   -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

हो अभिशप्त पहुंच पाया मैं, सोमनाथ शिव सिर के ताज ।
जिनकी मर्यादा लूटी थी, बार अनेकों ग़ज़नी राज ।।

मर्माहत हो चला वहां से, गोदावरी गंगा तीर ।
सूपनखा सोई वर्षों से, नकटी बन उन लक्ष्मण धीर ।।

मार्ग अनेकों देव-देवता, से बोझिल था, पूरा देश ।
भक्ति द्राविड़ी की महिमा थी, शैव, वैष्णवों के वे वेश ।।

तिरुपति बालाजी का मंदिर, भक्त-जनों की भीड़ अपार ।
भरी प्रणामी पूर्ण आरती, आर्तजनों का पारावार ।।

कहीं छोड़ आया था पीछे, शिरडी के वे साईराम ।
भक्तजनों की भीड़ देखकर, बढ़ा भक्ति का भक्ति-ललाम ।।

आगे मिले, सत्य साईं जो, अंतर टूटा भेद-अभेद ।
संत-भक्त के भेद मिटाएं, देवतुल्य वे विग्रह भेद ।।

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