संचय कीट
धरती की कोख को
चीरकर तुम्हारा वह
छोटा-सा सृष्टि-बीज
दर्शन को उत्सुक
बलवती इच्छा आकांक्षा से
उल्लास लिए पनपा
पल्लवित-पुष्पित हुए
फल के भार से तुम
सदा झुकते रहे ।
आदान-प्रदान का रहस्य जान
अनवरत कर्ण-हरिश्चन्द्र जैसे
फल-दान करते रहे,
पर दैव योग से
वर्षा, ग्रीष्म-शीत की विषमता
वा संचय प्रवृत्ति-आग्रह की
अपेक्षा की तुमने ।
अपनी कृपणता बरती-
फलों पर स्वायत्तता
की मुहर लगा दी ।
तब उन्हीं फलों के
कीटाणुओं ने शरीर में
प्रवेश कर तुम्हारी
नित्यता समाप्त कर दी ।
अतः, पूर्व जन्म में
यह न भूलोगे कि
ग्रहण वा संचय का
अर्थ है कल्याणार्थ
अनवरत उपयुक्त दान
वरन् संचय के
दुर्भेद्य कीटाणु
तुम्हारे व्यष्टि ही नहीं
अपितु सारी सृष्टि का
संहार कर बसाएंगे
नयी वसुन्धरा
करने को नई सृष्टि
विश्व का नव निर्माण
जगत की अबाधता की
स्थापना को जिसमें स्पष्ट
मात्र स्थिर स्थापित
चिरन्तन नैसर्गिक रहस्य ।
ग्रहण वा संचय का
अर्थ है कल्याणार्थ
अनवरत उपयुक्त दान,
वरन् संचय के
दुर्भेद्य कीटाणु
तुम्हारे व्यष्टि ही नहीं
अपितु सारी सृष्टि का
संहार कर बसाएंगे
नई वसुंधरा
करने को नई सृष्टि
विश्व का नव निर्माण
जगत की अबाधता की
स्थापना को जिसमें स्पष्ट
मात्र स्थिर स्थापित
चिरन्तन नैसर्गिक रहस्य ।
-नियति न्यास
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