धर्म बनाम संप्रदाय
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्यायधर्म सदा जो धारण करता, कहीं कर्म की राह ।
सत्य, अहिंसा, प्रेम सिखाता, और नम्रता चाह ।।
कोई मत या धर्म कहीं है, ईश्वर का सिद्धांत नहीं ।
वह तो है, अध्यात्म चेतना, आत्म-विकास, प्रकाश कहीं ।।
धर्म जोड़ता, व्यक्ति को, सदाचार सिखलाता ।
सदा सुपथ सत्कर्म का, मार्ग कहीं दिखलाता ।।
धर्म भिन्न है, संप्रदाय से, यह जन समझ न पाया ।
संप्रदाय के घेरे में, बंधकर वह जीता आया ।।
धर्म जोड़ता, प्राणि-जगत को, संप्रदाय मति तोड़ ।
यही द्वेष का कारण बनता, कौन लगाए, होड़ ।।
होता, धर्म उदार है, संप्रदाय संकीर्ण ।
धर्म सदा अमृत सदृश, संप्रदाय विष जीर्ण ।।
धर्म ग्राह्य आचरण योग्य है, इसके हैं, आचार विशुद्ध ।
संप्रदाय है, प्रश्न चिह्न बन, जीता कितना शुद्ध ।।
संप्रदाय जो आदर करता, सबका सदा समान ।
वह सबसे आदर पाता है, सार्वभौम बन जान ।।
जब वह दुर्लभ सदविवेक से, अपने को पहचाने ।
सबसे प्रति उदार बनकर, वह आत्म सदृश जग जाने ।।
संप्रदाय आचार-संहिता, कहीं नहीं टकराए ।
फिर उसके मन शान्ति हो, और समृद्ध बन जाए ।।
संप्रदाय या विश्वयुद्ध के, कलह सभी सर जाएं ।
सभी मनोरथ पूर्ण हों, शान्ति, प्रेम सरसाएं ।।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें