दर्पण
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय
जहां कहीं भी आप खड़े हों
चाहे हिमगिरि या घाटी ।
सिंहासन विक्रम के बैठे
अथवा बैठे हों माटी ।।
कहीं बैठ नन्दन कानन में
भरते हों छवि की मुस्कान ।
युद्धक्षेत्र में डटकर पैनी
हों निकालते, अपनी म्यान ।।
कहीं आपकी परिभाषा को
कोई न दे पाएगा ।
कहां आप क्या किए जा रहे
दर्पण ही बतलाएगा ।।
-नियति निसर्ग
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