मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012


विक्षिप्ता 


अलीपुर के 
मुद्राभवन का सिंहद्वार 
डायमण्ड हार्बर का जनपथ -
विक्षिप्ता का आवास । 

विक्षिप्ता- नाम से लक्ष्मी 
डायमण्ड की दीपिका । 
सरकारी कारिंदे ने
अपहृत कर उसकी भूमि
कर दिया था, निर्वासित
वही आज बनी है- विक्षिप्ता । 

उसके पति नारायण का
छः मास पूर्व 
अपहरण ।
विक्षिप्ता की विभ्रम की
चरमावस्था;
हाय ! हाय !
एक करुण
कथा के साथ
विक्षिप्ता का 
बस-प्रवेश । 

कुछ क्षण पश्चात्  
टिकिट ! टिकिट !
हाय ! नारायण, कहाँ आई ?
चल हट, महावीर तल्ला.
हाय ! हाय !
महावीर, महाबली हनुमान,
त्रेता की सीता के उद्धारक !
आज कलि के नर-नारायण 
अपहृत, निरुद्देश्य । 

वे थे शेषशायी 
ये पथशायी ;  
सहस्त्र दलस्थ थे वे
पर्ण-पथशायी, ये । 
बली महावीर-
तुमसे आशाएं अनेक
कारण-  तुम्हारी अपेक्षा
नर-नारायण श्रीराम ने की,
क्योंकि तुम 
नर नहीं वानर थे-
कितने सजग आस्थावान
कृतज्ञ, स्वामिभक्त, विश्वासपात्र 
जिनकी छाया से 
आज का मानव अति दूर-
वंचित-प्रवंचित 
प्रताड़ित-उपेक्षित । 

चतुर्दिक 
वाह ! वाह ! के घोर 
अट्टहास,
पर मध्य में 
हाय ! हाय ! के 
असहाय स्वर की 
अबाध अनुगूँज । 
मात्र नब्बे घटिकाओं के
करुण क्रन्दन पश्चात् 
नारायण की खोज में
विक्षिप्ता लक्ष्मी भी अपहृत ।  

एक सज्जन  के 
आग्रह पर दैनिकी की अनुगूँज-
एका अर्द्ध वयसा 
मध्योच्च, गौरी
नामोच्चार लक्ष्मीति अभिहिता   
त्रिदिवस पूर्वे अपहृता । 

संधान-
बली महावीर  
मिसिंग परसन्स स्क्वाड,
भवानी भवन, कोलकाता । 

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