विक्षिप्ता
अलीपुर के
मुद्राभवन का सिंहद्वार
डायमण्ड हार्बर का जनपथ -
विक्षिप्ता का आवास ।
विक्षिप्ता- नाम से लक्ष्मी
डायमण्ड की दीपिका ।
सरकारी कारिंदे ने
अपहृत कर उसकी भूमि
कर दिया था, निर्वासित
वही आज बनी है- विक्षिप्ता ।
उसके पति नारायण का
छः मास पूर्व
अपहरण ।
विक्षिप्ता की विभ्रम की
चरमावस्था;
हाय ! हाय !
एक करुण
कथा के साथ
विक्षिप्ता का
बस-प्रवेश ।
कुछ क्षण पश्चात्
टिकिट ! टिकिट !
हाय ! नारायण, कहाँ आई ?
चल हट, महावीर तल्ला.
हाय ! हाय !
महावीर, महाबली हनुमान,
त्रेता की सीता के उद्धारक !
आज कलि के नर-नारायण
अपहृत, निरुद्देश्य ।
वे थे शेषशायी
ये पथशायी ;
सहस्त्र दलस्थ थे वे
पर्ण-पथशायी, ये ।
बली महावीर-
तुमसे आशाएं अनेक
कारण- तुम्हारी अपेक्षा
नर-नारायण श्रीराम ने की,
क्योंकि तुम
नर नहीं वानर थे-
कितने सजग आस्थावान
कृतज्ञ, स्वामिभक्त, विश्वासपात्र
जिनकी छाया से
आज का मानव अति दूर-
वंचित-प्रवंचित
प्रताड़ित-उपेक्षित ।
चतुर्दिक
वाह ! वाह ! के घोर
अट्टहास,
पर मध्य में
हाय ! हाय ! के
असहाय स्वर की
अबाध अनुगूँज ।
मात्र नब्बे घटिकाओं के
करुण क्रन्दन पश्चात्
नारायण की खोज में
विक्षिप्ता लक्ष्मी भी अपहृत ।
एक सज्जन के
आग्रह पर दैनिकी की अनुगूँज-
एका अर्द्ध वयसा
मध्योच्च, गौरी
नामोच्चार लक्ष्मीति अभिहिता
त्रिदिवस पूर्वे अपहृता ।
संधान-
बली महावीर
मिसिंग परसन्स स्क्वाड,
भवानी भवन, कोलकाता ।
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