कर्तव्य बोध
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्यायश्रमिक के श्रम सीकर
बिखरेते रहें, अनुक्षण।
असकी आत्मा की सुगन्ध,
रयि के सोमतत्व।
शीत की शीतता में
संगर्षरत कृषक
करता रहे, दिन-दिन ।
लहलहाती फसलों की
हरीतिमा में स्नेहित स्नान ।
अध्यापक,
अपने जन्म-जन्मांतर के
सारे संचित पुण्य,
संजो दे, निष्काम ;
शिष्य की झोली में ।
वैज्ञानिक बिखेर दे,
अपने बुद्धि के वैभव,
क्रमिक विकास यात्रा में,
सृष्टि की सुरक्षा में ।
रचनाकार रच दे,
अपनी आत्मा के संस्पर्श से,
युवक्रांति के माध्यम से,
एक नया इतिहास ;
फूट पड़ें, नव्यता के गान ।
नेता अपने श्वेत परिधान में
बो जाए, आशा के बीज,
दे जाए, भोजन, वस्त्र, आवास,
शिक्षा, संस्कार, व्यापक
युवक्रान्ति।
अभिनेता अपने रंगमंच से
बांट जाए, असीम मुस्कान
डुबो जाए, अवसाद,
प्रशान्त की गहराई में ।
चिर आह्लाद के आंसू
धो डालें, समस्त क्लेद-विषाद ;
रचाएं, एक नया इतिहास,
अजेय युवक्रान्ति
का, कुलाधिपति राष्ट्र का ।
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