मां शारदे !
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय
जननी है, तू वेद की, वीणा, पुस्तक हाथ ।
करुणार्द्र तेरे नयन, जन मानस की माथ ।।
सर्व व्याप्त निरवधि रही, शुभ्र वस्त्र संपृक्त ।
सदा निनादित नेह से, स्त्रोत पयस्विनि सिक्त ।।
विश्व पटल पर है इला, अंतरिक्ष में ख्यात ।
कहीं भारती स्वर्ग में, ब्रह्मलोक प्रख्यात ।।
जहां स्वर्ग में सूर्य है, वहीं मर्त्य सुविवेक ।
अन्तर्मन चेतन करे, यह तेरी गति नेक ।।
ऋद्धि-सिद्धि है जगत में, ज्ञान यज्ञ जप-जाप ।
अभयदान दे, जगत को, हर ले सब परिताप ।।
तू देवी अभिव्यक्ति की, जग है, तेरा दास ।
सुख-सम्पत्ति से पूर्ण कर, हर ले, सब संत्रास ।।
-नियति निसर्ग से.

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