मैं कवि हूं ; पर, कविता नहीं लिखता !
भूमिका प्रारम्भ होते ही मन ने प्रश्न किया -
यह कैसा चक्रवात ?
सूर्य अपनी किरणों से ऊष्मा की ऊर्जा न बिखेरे,
मेघ वृष्टि से विरमित हो जाय,
वृक्ष फलदान की क्रिया से विश्राम ले ले,
वसुन्धरा अपना धैर्य छोड़ दे ।
यह सब क्या हो रहा ?
प्रत्येक स्थावर-जंगम का अपना धर्म होता है ;
फिर मैं, कि प्रेरणा मिली- सावधान !
तुम कवि हो ; पर, कविता न लिखना ।
कारण, कविता कठोर सत्य है ;
जिसकी आंच बड़ी तीव्र होती है ।
उसे तुम सह न पाओगे ।
तब सत्य का अनादर होगा ।
दोहरे व्यक्तित्व का चित्रण करोगे ;
क्योंकि, एकनिष्ठ व्यक्तित्व खोजने पर भी न मिलेगा ।
अनुशासन से दूर होते जाओगे ;
क्योंकि, शासन की बागडोर ढीली पड़ गई ।
आचार-संहिता के अभाव में फंसोगे ;
क्योंकि, वह शब्दकोश का विषय से गया ।
समदृष्टि और वास्तविकता, वणिक्वृत्ति में समा गयीं ।
भारतीय भारत और राष्ट्रीय राष्ट्र
धर्म-निरपेक्षता की भेंट चढ़ गए ।
भ्रष्टाचार एवं देश की भ्रष्ट राजनीति ने व्यष्टि-समष्टि
एवं देश को कहीं का न छोड़ा ।
आज जनतंत्र का अभिमन्यु विषमताओं के
व्यूह में चीत्कार कर रहा,
पर, किसी को कान करने का अवकाश नहीं ।
इसीलिए तो कह रहा हूं - बुद्धि की महामारी में
तुम्हारी कविता की डोंगी हताश होने लगेगी,
जबकि, कविता की जहाजरानी प्रशान्त से नियागरा में
सीना ताने निर्भय-निःशंक तिरती है ।
मानसिकता के अभाव में जनमानस को उपदेश देना
बन्दर को तलवार सौंपना होगा ।
इसीलिए, तो..... पर, कविता एक कला है ।
मनोरंजन का साधन, उसका पर्य्याय ;
वह मन को हंसाती-सरसाती, लोक-परलोक दर्शाती ।
मानस का श्रृंगार कर मलिनता के भ्रम को भगाती ।
खिन्नता की काई काटती और
हंसाते-हंसाते आंखों को सरसा देती है ।
फिर, सोचता हूं - कविता जीवन है -
जो व्यक्ति को जीना सिखाती है ।
सिखाती, अनुशासन,
कराती कर्म, चराती धर्म, निराती न्याय
और देती लोक-परलोक, स्वर्ग-मर्त्य, मुक्ति-निर्वाण ।
यह है, सेतु, महासेतु
जिससे जीव इहलोक से परलोक का मार्ग उकेरता ।
जगत-प्रवाह चला जा रहा है, चलता जाएगा,
अज्ञात की ओर, चिति के परे ।
कविता है -
जीवन में साहसियता की उमंग-तरंग
जिसने बनाया, व्यक्ति को भगीरथ,
टाटा स्टील में नहीं,
प्रकृति के प्रेरणा-जनित कारखाने में,
सशक्त कर्म-ज्ञानेन्द्रियों
और दो हजार करोड़ कोशिकाओं के
कम्प्यूटर मस्तिष्क सहित,
जिसके मार्ग में कभी दिक्शूल न आया ।
कविता की प्रेरणा ने बर्बरता के विरोध में
हाथ उठाकर शपथ दिलाई -
आततायियों को ध्वस्त करना होगा, अपरिहार्य ।
कविता किसी रस-विशेष में निःसृत होती,
जो पेय नहीं, पेप्सी नहीं, और कुछ
जो मुरझाए मन को हरा करती है ।
यह है, सभी रोगों की अचूक महौषधि ;
प्रेमी-प्रमिका के हताश-निराश मनों में
करती, आशा के संचार ।
कविता समय से अपने रंग बदला करती ;
पर, यह सरीसृप नहीं ।
पुष्प से कोमल, वज्र से कठोर,
आत्म-समर्पण, आत्म निवेदन, प्रतत्ति अथवा और कुछ ।
कविता ने विश्वात्मा को निःशस्त्र करा
घोर युद्ध की दी, प्रेरणा ।
असंख्य आततायियों के पतन से कांप उठी वसुन्धरा ।
कितने सिन्दूर धुल गये, कितने गोद हो गये, सूने,
तब कहीं न्याय और धर्म बचे ।
फिर, कर्मठ संन्यासी ने संभाला, शासन-भार,
कारण, स्वर्ग में था, सब कुछ अप्राप्य, अकरणीय,
कर्म का सर्वथा अभाव ।
कविता है -
वाग्देवी की अधिष्ठात्री सरस्वती ;
जो लजाती, लक्ष्मी को और बोलती सबके सिर चढ़कर ।
कविता ब्रह्म है, जिससे आविर्भूत हैं,
समस्त सृष्टि के विकासक्रम जो अनन्त हैं, अनादि हैं,
अकथ और बुद्धि के परे हैं ।
कविता की परिभाषा पूछिए -
व्यास, पराशर, नारद से ; भवभूति, कालिदास से ;
सूर और तुलसी से ।
कविता है -
जगत का कारण, समस्त सृष्टि का स्पन्दन,
जड़-चेतन की शाश्वत अनुभूति,
उनकी सनातन अभिव्यक्ति ।
अवसाद-सहचरी, आह्लाद-सुरमिता,
सुख-दुःख-सिद्ध रसायन, अमृत संजीवनी,
ऐहिक, पारमार्थिक सिद्धि ।
कविता माया प्रकृत्ति है, जीव है, ब्रह्म है,
पृथ्वी, सूर्य, वायु और आकाश है ।
वह शरीर है, आत्मा है, प्राण है ।
मंत्र में प्राण फूंकनेवाला बीजमंत्र है ।
कविता पयस्विनी गंगा है,
जो पंचभूत के स्फुरण से चेतना में हुंकार भरती है ।
कविता है -
भाव या अभावगत,
लोक-परलोकगत, आत्म-परमात्मगत ;
बोध की पराश्रित, विवेक परिमार्जित,
प्रसूत विवेक, सर्वथा कल्याणकर,
अवधि-अबाधित, कालजयी, आर्ष-लोक-वेद-विद्ध,
बुद्धि-विवेक की परिधि के परे, सर्वव्याप्त, निरवधि,
सोsहं से हंसो तक पहुंचानेवाली,
जिसकी अजस्त्र गरिमा से सृष्टि का
अणु-अणु, कण-कण मुखर है ।
इसीसे, कहने के लिए बाध्य हूं -
मैं कवि हूं ; पर, कविता नहीं लिखता !
-नियति निक्षेप
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