शनिवार, 27 अक्टूबर 2012


मैं कवि हूं ; पर, कविता नहीं लिखता !


भूमिका प्रारम्भ होते ही मन ने प्रश्न किया -
यह कैसा चक्रवात ? 
सूर्य अपनी किरणों से ऊष्मा की ऊर्जा न बिखेरे, 
मेघ वृष्टि से विरमित हो जाय, 
वृक्ष फलदान की क्रिया से विश्राम ले ले, 
वसुन्धरा अपना धैर्य छोड़ दे । 
यह सब क्या हो रहा ? 

प्रत्येक स्थावर-जंगम का अपना धर्म होता है ; 
फिर मैं, कि प्रेरणा मिली- सावधान ! 
तुम कवि हो ; पर, कविता न लिखना ।
कारण, कविता कठोर सत्य है ;
जिसकी आंच बड़ी तीव्र होती है । 
उसे तुम सह न पाओगे । 
तब सत्य का अनादर होगा । 
दोहरे व्यक्तित्व का चित्रण करोगे ;
क्योंकि, एकनिष्ठ व्यक्तित्व खोजने पर भी न मिलेगा । 
अनुशासन से दूर होते जाओगे ;
क्योंकि, शासन की बागडोर ढीली पड़ गई । 
आचार-संहिता के अभाव में फंसोगे ; 
क्योंकि, वह शब्दकोश का विषय से गया । 
समदृष्टि और वास्तविकता, वणिक्वृत्ति में समा गयीं । 

भारतीय भारत और राष्ट्रीय राष्ट्र 
धर्म-निरपेक्षता की भेंट चढ़ गए । 
भ्रष्टाचार एवं देश की भ्रष्ट राजनीति ने व्यष्टि-समष्टि
एवं देश को कहीं का न छोड़ा । 
आज जनतंत्र का अभिमन्यु विषमताओं के 
व्यूह में चीत्कार कर रहा, 
पर, किसी को कान करने का अवकाश नहीं । 

इसीलिए तो कह रहा हूं - बुद्धि की महामारी में 
तुम्हारी कविता की डोंगी हताश होने लगेगी, 
जबकि, कविता की जहाजरानी प्रशान्त से नियागरा में 
सीना ताने निर्भय-निःशंक तिरती है । 
मानसिकता के अभाव में जनमानस को उपदेश देना 
बन्दर को तलवार सौंपना होगा । 

इसीलिए, तो..... पर, कविता एक कला है । 
मनोरंजन का साधन, उसका पर्य्याय ; 
वह मन को हंसाती-सरसाती, लोक-परलोक दर्शाती । 
मानस का श्रृंगार कर मलिनता के भ्रम को भगाती । 
खिन्नता की काई काटती और 
हंसाते-हंसाते आंखों को सरसा देती है । 

फिर, सोचता हूं - कविता जीवन है - 
जो व्यक्ति को जीना सिखाती है । 
सिखाती, अनुशासन, 
कराती कर्म, चराती धर्म, निराती न्याय
और देती लोक-परलोक, स्वर्ग-मर्त्य, मुक्ति-निर्वाण । 
यह है, सेतु, महासेतु 
जिससे जीव इहलोक से परलोक का मार्ग उकेरता । 
जगत-प्रवाह चला जा रहा है, चलता जाएगा, 
अज्ञात की ओर, चिति के परे । 

कविता है -
जीवन में साहसियता की उमंग-तरंग 
जिसने बनाया, व्यक्ति को भगीरथ, 
टाटा स्टील में नहीं, 
प्रकृति के प्रेरणा-जनित कारखाने में, 
सशक्त कर्म-ज्ञानेन्द्रियों 
और दो हजार करोड़ कोशिकाओं के 
कम्प्यूटर मस्तिष्क सहित, 
जिसके मार्ग में कभी दिक्शूल न आया । 
कविता की प्रेरणा ने बर्बरता के विरोध में 
हाथ उठाकर शपथ दिलाई -
आततायियों को ध्वस्त करना होगा, अपरिहार्य । 

कविता किसी रस-विशेष में निःसृत होती, 
जो पेय नहीं, पेप्सी नहीं, और कुछ 
जो मुरझाए मन को हरा करती है । 
यह है, सभी रोगों की अचूक महौषधि ;
प्रेमी-प्रमिका के हताश-निराश मनों में 
करती, आशा के संचार । 
कविता समय से अपने रंग बदला करती ;
पर, यह सरीसृप नहीं । 
पुष्प से कोमल, वज्र से कठोर, 
आत्म-समर्पण, आत्म निवेदन, प्रतत्ति अथवा और कुछ । 

कविता ने विश्वात्मा को निःशस्त्र करा 
घोर युद्ध की दी, प्रेरणा । 
असंख्य आततायियों के पतन से कांप उठी वसुन्धरा । 
कितने सिन्दूर धुल गये, कितने गोद हो गये, सूने, 
तब कहीं न्याय और धर्म बचे । 
फिर, कर्मठ संन्यासी ने संभाला, शासन-भार, 
कारण, स्वर्ग में था, सब कुछ अप्राप्य, अकरणीय, 
कर्म का सर्वथा अभाव । 

कविता है -
वाग्देवी की अधिष्ठात्री सरस्वती ;
जो लजाती, लक्ष्मी को और बोलती सबके सिर चढ़कर । 
कविता ब्रह्म है, जिससे आविर्भूत हैं, 
समस्त सृष्टि के विकासक्रम जो अनन्त हैं, अनादि हैं, 
अकथ और बुद्धि के परे हैं । 
कविता की परिभाषा पूछिए - 
व्यास, पराशर, नारद से ; भवभूति, कालिदास से  ;
सूर और तुलसी से । 

कविता है -
जगत का कारण, समस्त सृष्टि का स्पन्दन, 
जड़-चेतन की शाश्वत अनुभूति, 
उनकी सनातन अभिव्यक्ति । 
अवसाद-सहचरी, आह्लाद-सुरमिता,
सुख-दुःख-सिद्ध रसायन, अमृत संजीवनी, 
ऐहिक, पारमार्थिक सिद्धि । 
कविता माया प्रकृत्ति है, जीव है, ब्रह्म है, 
पृथ्वी, सूर्य, वायु और आकाश है । 
वह शरीर है, आत्मा है, प्राण है । 
मंत्र में प्राण फूंकनेवाला बीजमंत्र है । 
कविता पयस्विनी गंगा है, 
जो पंचभूत के स्फुरण से चेतना में हुंकार भरती है । 

कविता है - 
भाव या अभावगत, 
लोक-परलोकगत, आत्म-परमात्मगत ;
बोध की पराश्रित, विवेक परिमार्जित, 
प्रसूत विवेक, सर्वथा कल्याणकर, 
अवधि-अबाधित, कालजयी, आर्ष-लोक-वेद-विद्ध,
बुद्धि-विवेक की परिधि के परे, सर्वव्याप्त, निरवधि, 
सोsहं से हंसो तक पहुंचानेवाली, 
जिसकी अजस्त्र गरिमा से सृष्टि का 
अणु-अणु, कण-कण मुखर है । 
इसीसे, कहने के लिए बाध्य हूं -
मैं कवि हूं ; पर, कविता नहीं लिखता !

                                 -नियति निक्षेप 

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