बुधवार, 31 अक्टूबर 2012


स्वाधीनता की नियति 


स्वाधीनता प्रणम्य है, जनमानस को आज । 
वह अपने पुरुषार्थ से, करे जगत के काज ।। 

स्वाधीनता दे सके, भोजन वस्त्र आवास । 
शिक्षा, स्वास्थ्य सदा रहें, प्रस्तुत उसके पास ।। 

जो स्वतंत्रता दूर हो, जनमानस के काज । 
पराधीनता है भली, ढकती तन ही लाज ।। 

कुर्सी की स्वाधीनता, करे घृणित अपराध । 
लोक लाज को बेचकर, पूरे अपनी साध ।। 

जनता की चिन्ता नहीं, स्वाधीनता अनर्थ । 
कुर्सी के स्वामी बने, किया कराया व्यर्थ ।। 

मुंह पर पट्टी है जहां, कुछ कहना अपराध । 
वहां प्राण का भय रहा, बाधित बाध अबाध ।। 

चक्की है स्वाधीनता, पिसते कितने लोग । 
खाने को भोजन नहीं, यही मृत्यु का शोक ।। 

शिविरों का अब कुम्भ है, जिसमें भेड़ धसान । 
सुख सपना जन का हुआ, देवल कहें मसान ।। 

स्वाधीनता कहीं भली, दुश्चिन्ता दिन दूर । 
समता सुख की रात दे, हुआ मनोरथ पूर ।। 

भोजन वस्त्र विहीन हो, हो स्वतंत्रता हास । 
ऐसा हो जीवन दुःखद, बस वैतरणी पार ।। 

                                         -नियति निसर्ग 

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