स्वाधीनता की नियति
स्वाधीनता प्रणम्य है, जनमानस को आज ।
वह अपने पुरुषार्थ से, करे जगत के काज ।।
स्वाधीनता दे सके, भोजन वस्त्र आवास ।
शिक्षा, स्वास्थ्य सदा रहें, प्रस्तुत उसके पास ।।
जो स्वतंत्रता दूर हो, जनमानस के काज ।
पराधीनता है भली, ढकती तन ही लाज ।।
कुर्सी की स्वाधीनता, करे घृणित अपराध ।
लोक लाज को बेचकर, पूरे अपनी साध ।।
जनता की चिन्ता नहीं, स्वाधीनता अनर्थ ।
कुर्सी के स्वामी बने, किया कराया व्यर्थ ।।
मुंह पर पट्टी है जहां, कुछ कहना अपराध ।
वहां प्राण का भय रहा, बाधित बाध अबाध ।।
चक्की है स्वाधीनता, पिसते कितने लोग ।
खाने को भोजन नहीं, यही मृत्यु का शोक ।।
शिविरों का अब कुम्भ है, जिसमें भेड़ धसान ।
सुख सपना जन का हुआ, देवल कहें मसान ।।
स्वाधीनता कहीं भली, दुश्चिन्ता दिन दूर ।
समता सुख की रात दे, हुआ मनोरथ पूर ।।
भोजन वस्त्र विहीन हो, हो स्वतंत्रता हास ।
ऐसा हो जीवन दुःखद, बस वैतरणी पार ।।
-नियति निसर्ग
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