गुरुवार, 1 नवंबर 2012




शब्द का वाच्यार्थ तलहीन सागर की तरह परम गहन है, जहां बड़े-बड़े युग-युगान्त अपनी समग्रता के साथ समाहित हैं ; जहां बड़े-बड़े युग-युगान्त अपनी समग्रता के साथ समाहित हैं ; वहीं विश्वकाव्य का महान् उदयाचल सर्वतोभावेन सर्वत्र प्रखर और प्राणभृत्त है । 
उसके युगान्तराल की धारावाहिकता सामान्य नहीं, वह दिगन्तव्यापी है । काल के खण्ड और अखण्ड प्रवाह में कविता की जीवन्त पहचान का सही चिरन्तन रस-रहस्य है - चाहे वह महर्षि परम्परा का काव्य हो या हेलेनिक प्रस्तुति । इस स्तुत्य संकलन की ये कविताएं अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के साथ यहां विद्यमान हैं, जहां देश-काल-विश्व-राष्ट्र-इतिहास-धर्म-समाज-मानव अपने भूत, भविष्य और वर्तमान के साथ साकार हो गया है । यही तो है, सनातन की छाया का काव्यमय 'नियति-निक्षेप' । कविताओं के मध्य उभरती हुई लोक मंगल-संस्कृति मानव के सम्पूर्ण परिवेश में नये प्राणों का संचार कर देती है । जहां वह दर्शन के विविध आयामों का स्पर्श करती हुई अधिब्रह्माण्डीय धरातल तक पहुंचा देती है, वहीं संकलन की प्रबुद्ध कविताओं का भविष्य हमें २१वीं शती के प्रति आश्वस्त बना देता है । 

दिनांक ः ७.७.२००१
                                                         डॉ. वासुदेव पोद्दार 
                                                        व्याख्याता एवं प्रख्यात विद्वान, 
                                                       भारतीय वाड़्मय संस्कृति और इतिहास, कोलकाता  
(नियति-निक्षेप से)

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