महीयसी महादेवी वर्मा के प्रति
महादेवि ! नक्षत्र दीपिका,
साधना भवन की दीपशिखा, अक्षुण्ण वर्त्तिका ।
तेरी वीणा के स्वर, असीम चेतन का क्रन्दन ।
सौन्दर्यमयी अभिव्यक्ति, उस सूक्ष्म सत्य की ।
एक सूत्र में ग्रन्थिबद्ध कर, यामा में मुखरित, नीहार,
नीरजा, रश्मि और सान्ध्य गीत ।
वे अतीत के चित्र और स्मृति की रेखाएं ।
क्या मेरा परिवार, पथसाथी, हिमगिरि,
स्नेहिल, स्निग्ध, सुकोमल ।
मेखला-सृष्टि बन, मनहरता के अभिव्यंजक ।
करुण, प्रांजल संगीत, चिरन्तन, चिर चित्रोपम ।
स्वर साधन अनुरूप, दीर्घ निःश्वास अश्रु के बने नियामक ।
भावातिरेक, भावानुभूति की अमर साधिका ।
उस लोकोत्तर सत्ता के प्रति, प्रियतम में निष्णात प्रेम ।
उस रूढ़िग्रस्त नारी का प्रणय-निवेदन ।
पारमार्थिक स्वरूप सत्य का आत्मसात् कर निज पीड़ा में
विश्ववेदना का संयोजन ।
दीपशिखा-सी सौम्य, विलक्षण प्रतिभा ।
सृजन-बुद्धि, शालीन और निर्भीक
तूलिका प्रवण चितेरी ।
तू ब्रह्मलीन, निर्मुक्त बनी, अब ध्रुवतारक-सी
पीड़ा की अनुगूंज सुने, जग अन्तर्मन ।
अर्पित श्रद्धा सुमन,
अमर आत्मा के प्रति, देवि ! चिरन्तन ।
-नियति-निक्षेप
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