गुरुवार, 1 नवंबर 2012


महीयसी महादेवी वर्मा के प्रति 


महादेवि ! नक्षत्र दीपिका, 
साधना भवन की दीपशिखा, अक्षुण्ण वर्त्तिका । 
तेरी वीणा के स्वर, असीम चेतन का क्रन्दन । 
सौन्दर्यमयी अभिव्यक्ति, उस सूक्ष्म सत्य की । 

एक सूत्र में ग्रन्थिबद्ध कर, यामा में मुखरित, नीहार, 
नीरजा, रश्मि और सान्ध्य गीत । 
वे अतीत के चित्र और स्मृति की रेखाएं । 
क्या मेरा परिवार, पथसाथी, हिमगिरि, 
स्नेहिल, स्निग्ध, सुकोमल । 
मेखला-सृष्टि बन, मनहरता के अभिव्यंजक । 
करुण, प्रांजल संगीत, चिरन्तन, चिर चित्रोपम । 
स्वर साधन अनुरूप, दीर्घ निःश्वास अश्रु के बने नियामक । 

भावातिरेक, भावानुभूति की अमर साधिका । 
उस लोकोत्तर सत्ता के प्रति, प्रियतम में निष्णात प्रेम । 
उस रूढ़िग्रस्त नारी का प्रणय-निवेदन । 
पारमार्थिक स्वरूप सत्य का आत्मसात् कर निज पीड़ा में 
विश्ववेदना का संयोजन । 
दीपशिखा-सी सौम्य, विलक्षण प्रतिभा । 
सृजन-बुद्धि, शालीन और निर्भीक 
तूलिका प्रवण चितेरी । 

तू ब्रह्मलीन, निर्मुक्त बनी, अब ध्रुवतारक-सी
पीड़ा की अनुगूंज सुने, जग अन्तर्मन । 
अर्पित श्रद्धा सुमन, 
अमर आत्मा के प्रति, देवि ! चिरन्तन । 

                    -नियति-निक्षेप 

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