गुरुवार, 15 नवंबर 2012


युगकर्म 


देवासुर, कौरव-पाण्डव की लिप्सा, विजय क्रान्ति की रेखा । 
नर बलि की, की कभी न चिन्ता, मानवता मुख कभी न पेखा ।। 

लोख प्रभव, संहार दुष्ट जन, हो अनिवार्य उसे कर देते । 
फिर, तुम प्रेम-शान्ति के शर से, प्राणि-मात्र का भय हर लेते ।। 

सीख न पाये, शान्ति-प्रेम, वह मानवता की रीति । 
दया, अहिंसा या ममता से, रहे, दूर चाहे हो, प्रीति ।। 

युद्ध, युद्ध, हिंसा, हिंसा से, शमित कहां, कब होते हैं । 
ईर्ष्या, द्वेष और कटुता के, विष विषाक्त ये बोते हैं ।। 

कर्म अतीत है, वर्तमान है, कर्म भविष्यत् का व्यापार ।
कर्म नियति बन आगे चलता, ले अपने सारे अधिकार ।। 

अतः, करो करणीय सदा, तुम सुख समृद्धि पाओगे । 
विश्व झुकेगा, श्रेय मिलेगा, पुरुष-सिंह बन जाओगे ।। 

नर जीवन के लिए जगत ही, कर्मक्षेत्र कहलाता । 
यहां व्यक्ति पौरुष से सब कुछ, सहज प्राप्त कर जाता ।। 

प्रेम-शान्ति के अग्रदूत तुम, हो, मनु की सन्तान । 
याद करो अपने अतीत को, विभुता तने, वितान ।। 

पुरुष अर्थ ले, इस जग में तुम, सुखकर व्यूह रचाओ । 
जाड्य, द्वेष, कालुष्य मिटाकर, शान्ति, प्रेम सरसाओ ।। 

तब मानव, मानव बनकर, सुख शान्ति, प्रेम लाओगे । 
मां की स्नेहित छाया में तुम, सुख-समृद्धि पाओगे ।। 

                                                       -नियति निक्षेप 

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