प्रसाद की शती पर
जयशंकर ! अशिवेतर,
शंकर-प्रसाद,
भारतीय साधना-धारा के उन्नायक
काव्य-चिन्तन के गेटे,
बहुमुख प्रातिभ,
ऐहिक उत्थान-पतन के समद्रष्टा,
पारमार्थिक सत्य-विवेचक,
सदासद् के उदघोषक,
सम्प्रेषक विषाद-हर्ष के,
दर्शक निगूढ़,
स्वानुभूति दुःख-सुख विवृत्ति के,
जागरूक सत्ता रहस्यमय,
अभेदमयी भावना के संपोषक,
स्फुरक, जगत के जीव-तत्त्व के,
मनोभावना के विश्लेषक ।
कथा-काव्य-रूपक की प्रतिमा,
मानव समष्टि की शिवसत्ता,
सौन्दर्य, प्रणय की सानुभूति,
ज्ञान-कर्म, यौगिक उपासना के समन्वयक,
अन्तस्ताप शमित शिव प्रेरक,
व्यष्टिवाद, अध्यात्म-चेतना-क्रान्तिदूत,
सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति,
समग्रता में समासोक्ति ।
अबाह्य अगोचर, विश्वरूप आनन्द,
त्रिगुणात्मवाद, समरसता के प्रहरी-प्रचण्ड,
महाचिति दिव्य अनाहत सर्ववाद के,
तत्सम, ऊर्जा भाषा के प्रतिमान निकष,
अन्तर्मुखी कल्पना के इक्ष्वाकु,
मानस मर्मों के उद्घाटक, ऋषिश्री साहित्य के ।
हास-रुदन के अश्रु
सृजन-विकचित सहस्त्रदल,
अर्पित श्रद्धा-सुमन, दलों से शत-शत,
अमर आत्मा के प्रति, दिव्य चिरन्तन,
वरदेवी के वरद पुत्र, अशिवेतर जयशंकर ।
-नियति-निक्षेप
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