गुरुवार, 1 नवंबर 2012


प्रसाद की शती पर 


जयशंकर ! अशिवेतर, 
शंकर-प्रसाद, 
भारतीय साधना-धारा के उन्नायक 
काव्य-चिन्तन के गेटे, 
बहुमुख प्रातिभ, 
ऐहिक उत्थान-पतन के समद्रष्टा, 
पारमार्थिक सत्य-विवेचक, 
सदासद् के उदघोषक, 
सम्प्रेषक विषाद-हर्ष के, 
दर्शक निगूढ़, 
स्वानुभूति दुःख-सुख विवृत्ति के, 
जागरूक सत्ता रहस्यमय, 
अभेदमयी भावना के संपोषक, 
स्फुरक, जगत के जीव-तत्त्व के, 
मनोभावना के विश्लेषक । 

कथा-काव्य-रूपक की प्रतिमा, 
मानव समष्टि की शिवसत्ता, 
सौन्दर्य, प्रणय की सानुभूति, 
ज्ञान-कर्म, यौगिक उपासना के समन्वयक, 
अन्तस्ताप शमित शिव प्रेरक, 
व्यष्टिवाद, अध्यात्म-चेतना-क्रान्तिदूत, 
सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति, 
समग्रता में समासोक्ति । 

अबाह्य अगोचर, विश्वरूप आनन्द, 
त्रिगुणात्मवाद, समरसता के प्रहरी-प्रचण्ड, 
महाचिति दिव्य अनाहत सर्ववाद के, 
तत्सम, ऊर्जा भाषा के प्रतिमान निकष,
अन्तर्मुखी कल्पना के इक्ष्वाकु, 
मानस मर्मों के उद्घाटक, ऋषिश्री साहित्य के ।  

हास-रुदन के अश्रु
सृजन-विकचित सहस्त्रदल, 
अर्पित श्रद्धा-सुमन, दलों से शत-शत, 
अमर आत्मा के प्रति, दिव्य चिरन्तन, 
वरदेवी के वरद पुत्र, अशिवेतर जयशंकर । 

                    -नियति-निक्षेप 

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