कपिला-प्रसंग
प्रातःकाल, मीनाक्षी मन्दिर-परिसर,
शंख, घण्टे, घड़ियाल सहित वन्दना के स्वर,
कितने शान्तिकर, सुखकर !
नेत्रालय से निकलकर आर्केड तक गया था,
कि मिल गयी, कपिला
राजमार्ग पर भोजन की खोज में निरत ।
दोनों ने देख-परखा, एक दूसरे को,
फिर, कपिला ने पूछा- क्या देख रहे हो ?
मुझे पाओगे, केवल चित्रों में,
त्रिभंगी, मुरली मनोहर के पीछे वंशी की तान सुनते ।
वैतरणी के लिए मात्र घर में टंगे चित्र पर्याप्त होंगे ।
दो सप्ताह हो गए, क्या एक भी कौआ देखा है,
भवानी मीनाक्षी की नगरी में ?
वे भी त्रिचिर गये थे, भोग को, फिर लौटे नहीं ।
श्येनवन के निकट वे काकमेध में होम हो गए ।
तुम्हारे हितैषी मित्र, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु,
वनस्पति, स्थावर-जंगम, सारे आजीवन कारावासी,
इनकी परतन्त्रता पर मुहर, सुरक्षा के नाम पर ।
ये सफ़ारी पार्क, चिड़ियाखाने, मनोरंजन के पर्य्याय ;
इसके पश्चात् किनके लिये, ये सफ़ारी पार्क, चिड़ियाखाने ।
प्रभु तुम्हें सद् बुद्धि दे ।
-नियति निक्षेप
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें