गुरुवार, 15 नवंबर 2012


कपिला-प्रसंग 


प्रातःकाल, मीनाक्षी मन्दिर-परिसर, 
शंख, घण्टे, घड़ियाल सहित वन्दना के स्वर, 
कितने शान्तिकर, सुखकर !

नेत्रालय से निकलकर आर्केड तक गया था, 
कि मिल गयी, कपिला
राजमार्ग पर भोजन की खोज में निरत ।
दोनों ने देख-परखा, एक दूसरे को, 
फिर, कपिला ने पूछा- क्या देख रहे हो ? 
मुझे पाओगे, केवल चित्रों में, 
त्रिभंगी, मुरली मनोहर के पीछे वंशी की तान सुनते । 
वैतरणी के लिए मात्र घर में टंगे चित्र पर्याप्त होंगे । 

दो सप्ताह हो गए, क्या एक भी कौआ देखा है, 
भवानी मीनाक्षी की नगरी में ? 
वे भी त्रिचिर गये थे, भोग को, फिर लौटे नहीं । 
श्येनवन के निकट वे काकमेध में होम हो गए । 

तुम्हारे हितैषी मित्र, पशु-पक्षी, जीव-जन्तु, 
वनस्पति, स्थावर-जंगम, सारे आजीवन कारावासी, 
इनकी परतन्त्रता पर मुहर, सुरक्षा के नाम पर ।
ये सफ़ारी पार्क, चिड़ियाखाने, मनोरंजन के पर्य्याय ; 
इसके पश्चात् किनके लिये, ये सफ़ारी पार्क, चिड़ियाखाने । 
प्रभु तुम्हें सद् बुद्धि दे । 

                             -नियति निक्षेप 

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