देश में हिन्दी
हिन्दी में सब कुछ चले, खान, पान और दान ।यही विज्ञ का धर्म है, रख ले हिन्दी मान ।।
हिन्दी सदा संवारती, करे लोक के काज ।
बिना भाषा लिए, सजे न जग का साज ।।
हिन्दी आगे रख सदा, अपनी भाषा मेल ।
देशज भाषा को बढ़ा, रचती सच्चे खेल ।।
हिन्दीवासी घर करें, हिन्दी के सब काज ।
इसकी रक्षा में कभी, होगा नहीं अकाज ।।
मेल जोल के भाव से, बढ़ता हिन्दी क्षेत्र ।
अहिन्दीभाषी पढ़ें, खोलें अपने नेत्र ।।
बांग्ला, उड़िया, असमी, गुजराती के मोल ।
कन्नड़, तमिल, तेलुगु, दें निज खिड़की खोल ।।
परस्कर संवाद बढ़ा, करतीं कितने काज ।
कविता कथा प्रसंग के, पाकर मनहर राज ।।
पाठशाला हो प्राथमिक, कहीं माध्यमिक जान ।
हिन्दी भाषा सब पढ़ें, देकर उसको मान ।।
महाविद्यालय पढ़ें, सबका हिन्दी प्रेम ।
आकर्षित सबको करें, रखकर अपने नेम ।।
पाठन-पठन सभी करें, जिनको जितनी चाह ।
यही पाठ का धर्म है, सदा बनायें राह ।।
विश्वविद्यालय क्षेत्र में, हिन्दी आदर पाय ।
सबकी सेवा सिद्ध कर, वह सबको हरषाय ।।
हिन्दी में औद्योगिकी, क्या प्रौद्योगिकी हाथ ।
हिन्दी पाठी कुशल हों, पढ़ कौशल के साथ ।।
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