गुरुवार, 1 नवंबर 2012


मैं कविता !


मैं कविता, सौन्दर्य-जगत की, 
देश-प्रेम, वात्सल्य-लोक की, 
हास-व्यंग्य, जीवन-दर्शन की, 
भक्ति-रीति और अधुनातन की ;
छाया से अध्यात्म, प्रगति से उस प्रयोग तक ;
मैं समेटती, महाकाव्य से खण्ड-काव्य, 
आख्यानक गतियां, 
पाठ्य-गेय के सभी विमुक्तक । 

सान्ध्य-सुखद-सुषमा की बाला, 
इन्द्रधनुष सतरंगी हो अथवा मण्डल सप्तर्षि-जगत का ;
वलयित शारद मेघ ग्राम्यश्री । 
दीपक बन स्वातंत्र्य-प्रेम की, मैं स्फुलिंग अंगार 
सुबकती, धधकाती वह वह्नि-शिखा 
जो बन निरवधि, विस्तीर्ण जगाती, यम को । 

सावधान कर जननायक को 
देती, मैं उपहार हटा कारा के मोह-पाश को 
जिसके दंशन कभी नहीं स्तुति करे, संवरित । 
लौह श्रृंखला-भेद चाहता, फ़ौलादी कर्कच काटे, 
दासत्व-भाव की वह कारा
जो रक्त-बीज को आत्मसात् कर 
अन्ध हृदय के सारे बन्धन ।  

                       -नियति निक्षेप 

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