मैं कविता !
मैं कविता, सौन्दर्य-जगत की,
देश-प्रेम, वात्सल्य-लोक की,
हास-व्यंग्य, जीवन-दर्शन की,
भक्ति-रीति और अधुनातन की ;
छाया से अध्यात्म, प्रगति से उस प्रयोग तक ;
मैं समेटती, महाकाव्य से खण्ड-काव्य,
आख्यानक गतियां,
पाठ्य-गेय के सभी विमुक्तक ।
सान्ध्य-सुखद-सुषमा की बाला,
इन्द्रधनुष सतरंगी हो अथवा मण्डल सप्तर्षि-जगत का ;
वलयित शारद मेघ ग्राम्यश्री ।
दीपक बन स्वातंत्र्य-प्रेम की, मैं स्फुलिंग अंगार
सुबकती, धधकाती वह वह्नि-शिखा
जो बन निरवधि, विस्तीर्ण जगाती, यम को ।
सावधान कर जननायक को
देती, मैं उपहार हटा कारा के मोह-पाश को
जिसके दंशन कभी नहीं स्तुति करे, संवरित ।
लौह श्रृंखला-भेद चाहता, फ़ौलादी कर्कच काटे,
दासत्व-भाव की वह कारा
जो रक्त-बीज को आत्मसात् कर
अन्ध हृदय के सारे बन्धन ।
-नियति निक्षेप
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