मेरा आज नमन !
भारत ! तुझको नयी सदी पर, मेरा आज नमन ।
देश-विरोधी दीमक बनकर, देश चाटते जाते ।
धंधों में काला-सफेद कर, मस्ती-मौज मनाते ।।
कौन लड़े, इन तूफानों से, कैसे राह बनाए ।
कौन जुटाए, साहस कैसे, ऐसे मन के पाए ।।
चिन्ता बहुत अधिक हम करते, मानव-अधिकारों की ।
उन्हें खोज रखते, सहेजकर, थाती व्यापारों की ।।
काश ! कहीं चिन्ता होती, हैं, क्या करणीय हमारे ।
कभी नहीं कर्तव्य-विमुख होते, ये प्राणी सारे ।।
शासन को है, सदा अपेक्षा. बल की, अनुशासन की ।
बिना विवेक और अनुशासन, कहां चली, शासन की ।।
विघटन है, विनाश का सूचक, घातक एक कुमंत्र ।
नहीं बचाओगे, अपने को और अपना जनतंत्र ।।
बनकर तुम स्वायत्त, देश को नहीं बचा पाओगे ।
प्रेम, शान्ति, भ्रातृत्व-भाव से दूर चले जाओगे ।।
एकनिष्ठ, निरपेक्ष राष्ट्र, संप्रभु, स्वायत्त रहेगा ।
विघटन से बच, सार्वभौम-सत्ता के भार सहेगा ।।
राष्ट्र सोच हो, राष्ट्र कर्म हो, राष्ट्र धर्म सेवा हो ।
जन-मन अर्पित राष्ट्र-भाव हो, शान्ति, प्रेम, श्रद्धा हो ।।
नयी सोच के अंखुवे तनकर, नये प्राण विकसाएं ।
अन्धकार, निर्धनता, शोषण आप स्वयं सर जाएं ।।
लो, संकल्प, उठाओ, खरशर, अपने तन-मन-धन ।
भारत ! तुझको नयी सदी पर, मेरा आज नमन ।।
-नियति निक्षेप
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