गुरुवार, 15 नवंबर 2012


अर्जुन 


मैं अर्जुन, अतिकाय, 
खेचर और अनामय ;
मैं श्रावकवपु, श्रमण, दीर्घजीवी । 

मैं भीष्म भिषग्, 
आरिष्ट - वारुणी, 
विविधोषध जनकात्मज । 

मैं कालकूट भैरव, 
प्राणद शिवशंकर, 
जगती का दिव्य, नियामक । 

मैं बटी, आसव, अवलेह, 
शमित जग के सब रुक्-जुक् ;
मूल स्फार वपु-खचित, 
सुशोभित करूं, दिव्य आकृत, 
नीरोग-निर्मल । 

मै अकिरीटी, अनिकेत, 
स्थूल चर्मरुह अर्जुन ।  

                             -नियति निक्षेप 

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