अर्जुन
मैं अर्जुन, अतिकाय,
खेचर और अनामय ;
मैं श्रावकवपु, श्रमण, दीर्घजीवी ।
मैं भीष्म भिषग्,
आरिष्ट - वारुणी,
विविधोषध जनकात्मज ।
मैं कालकूट भैरव,
प्राणद शिवशंकर,
जगती का दिव्य, नियामक ।
मैं बटी, आसव, अवलेह,
शमित जग के सब रुक्-जुक् ;
मूल स्फार वपु-खचित,
सुशोभित करूं, दिव्य आकृत,
नीरोग-निर्मल ।
मै अकिरीटी, अनिकेत,
स्थूल चर्मरुह अर्जुन ।
-नियति निक्षेप
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