चिर पिपासु
चिरन्तन सत्य के बीच
श्रान्ति के अवगुण्ठन के पीछे
चिर प्रतीक्षापन्न निस्तब्ध
निरखता उस मुकुलित पुष्प को
और परखता उस पत्र का
निष्करुण निपात
जिसमें नव किसलय के
स्मिति-हास की परिणति
तथा रोदन के आवृत्त प्रलाप ।
निदर्शन-दर्शन के आलोक
विकचित-संकुचित
अन्वेषण-निमग्न
निरवधि विस्तीर्ण बाहुल्य में
उस सत्य के परिशीलन को ।
निर्विवाद नियति-नटी का
रक्षण प्रयत्न महार्णव मध्य
उत्ताल तरंग-आड़ोलित
उस पत्रस्थ पिपलिक का ।
मैं एकाकी
विपन्न विक्षिप्त स्थिर
अन्वेक्षणरत
भयंकर जलप्राप्त के समक्ष
चिर पिपासु मौन-मूक
ऊर्ध्व-दृष्ट निहारता
अगणित असंख्य
तारक लोक, तारावलि
जिनके रहस्य
अधुनातन विज्ञान के परे
सर्वथा अज्ञात
अस्थापित-अनान्वेषित ।
-नियति न्यास
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