आत्मतत्त्व
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय
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व्यक्ति स्वयं में पूर्ण जन्मता, वह अपूर्ण बन जाता है ।
कस्तूरी मृग बना भटकता, नहीं कहीं कुछ पाता है ।।
शैशव सुखी खिलौने पाकर, बाल्यकाल क्रीड़ा अनुरक्त ।
सज्जा में कौमार्य निरत है, यौवन विषय-भोग आसक्त ।।
वयःसंधि में पाने का सुख, और थोड़ी जीने की चाह ।
चला जा रहा व्यक्ति स्वयं वह, पा जाने को अपनी राह ।।
छोटी एक सफलता बनती, असफलता पर सेतु ।
वहां वयक्ति सागर तिर जाता, निज आस्था के हेतु ।।
-नियति निक्षेप
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