बुधवार, 31 अक्टूबर 2012


महाव्रत 


कुन्ती पुत्र, आदेश दें !
ले लूं प्रतिशोध, यही है अवसर ।

सोम ! यह क्या कहा ? 
घोर अन्याय, जघन्य अपराध । 
चला जा, यहां से तू, 
भले मेरा मित्र है और कहीं सुचिन्तक भी ; 
ऐसा न होने दूंगा ; कुरु की मर्यादा की 
सदा करूं रक्षा, यही मेरा व्रत । 

सारे मेरे पूर्व पुरुष कितने पुराण पुरुष 
खड़े आकाश में देखने को उत्सुक 
मेरा कौशल रण । 

अर्जुन से पराजित हो, 
हूंगा गर्वान्वित पर, तुक्ष सर्प की लूंगा न सहायता 
विकट रणभूमि में लोक वेद च्युत हो 
युद्ध मर्यादा का हनन न होने दूंगा । 

आज मेरे भाग्य का और कहीं परीक्षा का 
सौरज प्रदर्शन का आया सुअवसर 
स्वर्णिम अवसर हाथ से न जाने दूंगा 
मैं सूर्य पुत्र, आज उसे साक्षी मान, 
उतरूं रणक्षेत्र में । 

एक क्या शतार्जुन भी टिकें न समक्ष मेरे, 
दिखा दूं शूरवीरों को, 
कल, छल, नीति-नय छोड़ सारे अपमार्ग
मेरे बल सौरज से पराजित किरीटी हो, 
यही मेरी साध, सवितृ-मंडल को प्रणाम, 
अक्षत ऊर्जा को नमन !

                     -नियति निसर्ग 

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