महाव्रत
कुन्ती पुत्र, आदेश दें !
ले लूं प्रतिशोध, यही है अवसर ।
सोम ! यह क्या कहा ?
घोर अन्याय, जघन्य अपराध ।
चला जा, यहां से तू,
भले मेरा मित्र है और कहीं सुचिन्तक भी ;
ऐसा न होने दूंगा ; कुरु की मर्यादा की
सदा करूं रक्षा, यही मेरा व्रत ।
सारे मेरे पूर्व पुरुष कितने पुराण पुरुष
खड़े आकाश में देखने को उत्सुक
मेरा कौशल रण ।
अर्जुन से पराजित हो,
हूंगा गर्वान्वित पर, तुक्ष सर्प की लूंगा न सहायता
विकट रणभूमि में लोक वेद च्युत हो
युद्ध मर्यादा का हनन न होने दूंगा ।
आज मेरे भाग्य का और कहीं परीक्षा का
सौरज प्रदर्शन का आया सुअवसर
स्वर्णिम अवसर हाथ से न जाने दूंगा
मैं सूर्य पुत्र, आज उसे साक्षी मान,
उतरूं रणक्षेत्र में ।
एक क्या शतार्जुन भी टिकें न समक्ष मेरे,
दिखा दूं शूरवीरों को,
कल, छल, नीति-नय छोड़ सारे अपमार्ग
मेरे बल सौरज से पराजित किरीटी हो,
यही मेरी साध, सवितृ-मंडल को प्रणाम,
अक्षत ऊर्जा को नमन !
-नियति निसर्ग
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