सोमवार, 29 अक्टूबर 2012


मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 


वसुधा कितनी अनुशासित है, ग्रहपिण्ड हैं कितने कालनिष्ठ 
सारे पर्वत, सारी नदियां, सारे पशु-पक्षी ऊष्माणु, 
योद्धा-प्रचण्ड ये शक्तिमान, मानव-अतिमानव, ये दानव, 
सारे पथदर्शक, प्रतिहारी, मंत्री, शासक, नेता सारे, 
सारे खरशर, ये सव्यसाद, सारे पुण्यात्मा, ये पापी, 
ऋषिवर, मनीष ये विज्ञानी, सारे संगीत-कला पण्डित, 
ये चिदाकाश सौन्दर्यवाह, किसकी इंगिति पर चलते हैं, 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मै कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

यह किस अदृश्य की लीला है, जो काल-नियति की क्रीड़ा है, 

बस वायु बना, जिसका खम्भा, यह बेतारों की वीणा है । 
कितना असीम इसका पौरुष, कितना विशाल इसका वैभव, 
मिट्टी का कह लो, तुमा इसको, सोने का दाम लगा डालो, 
हीरे की इसकी माप-तौल, मोती के हाट चला डालो, 
यह मोल कहीं, बेमोल कहीं, मिट्टी के मोल न बिकता है, 
यह उस अनन्त की लीला की, कैसी अद्भुत, संरचना है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ?  

यह किस अनन्त की लीला है, जो बिन कागद के चित्रित है, 

अनगिन रंगों से मज्जित है, बहु अनुभावों से पूरित है । 
अनगिन साजों से शोभित है, मर्यादाओं से पालित है । 
इसकी गति थिरक हिला देती, तड़-तड़ित् वायु-वर्षा देती, 
सारी वसुधा को सींच-सींच, श्यामल कण-शस्य भरा देती, 
घन-वायु दिशा दिखला देती, वसुधा जीवन्त बना देती । 
ब्रह्माण्ड बना, जिसका कारण, वह किस विभुता का स्पन्दन है ? 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

वह सुषमा-सी सौन्दर्य नटी, मधु-सुधा लिए है, कहां खड़ी, 

पग की पायल की छाम-छूम से, मन के घुंघरू बजा रही । 
जब मस्ती और थिरकती है, पलकें भीगी-सी हो जातीं । 
नर्तन उसका क्या मचल-मचल, स्वर्गिक स्वर लहरी लाता है । 
जब नभ के बादल भेद-भेद, अपना परिचय दे जाते हैं  ; 
जब सरगम से बनकर मन में, हृद्तंत्री तार जुड़ाते हैं । 
उन सप्तस्वरों की थिरकन में, कितनी मादकता आ जाती ? 
यह कौन बताये, क्या जानूं  ;  मै कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

मादक वसन्त जब आता है, मन की उमंग बन जाता है  ; 

तब तरुवर मुकुट लगाते हैं, पौधों को शिखी बनाते हैं, 
कोयल जब कूक लगाती है, पंचम-स्वर में कुछ गाती है, 
मधु के सौरभ में झूम-झूम, कितने अलि-सुत बौराते हैं . 
प्रिय के चिन्तन में हो विह्वल, प्रेयसि कुछ बोल न पाती है
होठों की भाषा मौन बनी, आंखों से ढलती जाती है । 
सौन्दर्य घनत्व अकविता की, क्या गहराई-ऊंचाई है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं  ;  मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

निर्माण मनोहर होता है, चित्रण होता, कितना सजीव ;

संगीतों की स्वर-लहरी में, जब जाता है, सब जगत डूब । 
वह तभी जगाकर सब जग को, लोकित आनन्दित करता है ;
फिर, आशा और निराशा के मिस, गुन-गुन-गुन कुछ गुनता है । 
सोचता, बहुत कुछ, है, मन में, पर, पाता है, नामांश कहां ? 
जो हाथ नहीं कर पाते हैं, वह मन सब कुछ कर जाता है ;
फिर, मानव की चिति-प्रज्ञा की, कैसी चेतनता क्या जानूं ? 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

महाप्रलय जब आता है, वह अपना त्रास दिखाता है । 

तब कालपुरुष का रोष सभी को, एक-एक चट जाता है । 
सब खड़े-खड़े रह जाते हैं, बस, पड़े-पड़े रह जाते हैं । 
क्या जीव-जन्तु, जंगम-स्थावर, सब कालमुखी हो जाते हैं । 
फिर, पुरुष-प्रकृति हो एक तत्त्व, वसुधा जलमय हो जाती है । 
मनु भी न कभी बच पाता है, विभु की विभुता मिट जाती है ;
फिर काव्य कहां, लेखनी कहां, कैसा विधान, परिवर्तन है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

यह सृष्टि जगत का शाश्वत क्रम, अपना करतब दिखला जाती । 

उस जल प्लावन को सिमटाकर, बहु जीव-जन्तु उपजा जाती । 
जब पुरुष-प्रकृति के बीजरूप, शतरूपा-मनु आ जाते हैं ; 
तब मानव की प्रतिमाओं से, वसुधा के घऱ भर जाते हैं । 
चरैवेति समवेत स्वरों से, जब वह अलख जगाता है ।
गीता का संदेश गूंजकर, वसुधा पर छा जाता है । 
इस पंचभूत निर्मित जग की, कितनी स्थायी चेतनता है । 
यह कौन बताये, क्या जानूं ; मैं कवि हूं, कविता क्या जानूं ? 

                      -नियति निक्षेप 

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