उन्मेष
अभाव के कोटर में साधन विहीन
कालान्तर से बैठा निरुद्देश्य जन
ढोता रहा अबाध
अतीत के रोदन प्रलाप
दुर्निवार काल कर्कशता-
जनित विषाद ।
आशा के डिम्ब से
सन्तोष के रसायन प्रलेप
कर्म-साधना की ऊष्मा
और जिजीविषा की
शक्ति से संचालित
सरसे यह जीवन ।
हरने को अवसाद
नव प्रात से संजोया मन
खिले रस मिश्रित
उस मधुमय वसंत से
झंझावात शक्तिहीन सौरभ सम्पन्न मन
नाचे मयूर उस मधुश्री की छाँव में ।
जन-मन की शक्ति से
भागे भय जनित भीति उठे वह वर्ग
पड़ा है जो शताब्दियों से ।
समाज की कठोरता से
पीड़ित-प्रकम्पित, प्रताड़ित-उपेक्षित
अभिशप्त-परित्यक्त ।
-नियति न्यास
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