मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012


उन्मेष


अभाव के कोटर में साधन विहीन
कालान्तर से बैठा निरुद्देश्य जन
ढोता रहा अबाध
अतीत के रोदन प्रलाप
दुर्निवार काल कर्कशता-
जनित विषाद । 

आशा के डिम्ब से 
सन्तोष के रसायन प्रलेप
कर्म-साधना की ऊष्मा
और जिजीविषा की 
शक्ति से संचालित
सरसे यह जीवन । 

हरने को अवसाद
नव प्रात से संजोया मन 
खिले रस मिश्रित
उस मधुमय वसंत से
झंझावात शक्तिहीन सौरभ सम्पन्न मन
नाचे मयूर उस मधुश्री की छाँव में । 

जन-मन की शक्ति से
भागे भय जनित भीति उठे वह वर्ग
पड़ा है जो शताब्दियों से । 
समाज की कठोरता से
पीड़ित-प्रकम्पित, प्रताड़ित-उपेक्षित
अभिशप्त-परित्यक्त ।

         -नियति न्यास 

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