बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

                         वाराणसी के विश्वनाथ 

                                                        -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय

संगम वरुणा, असी बताता, नगरी शिवशंकर अभिराम ।
स्वर्गंगा में स्नान, ध्यान कर, पाया, विष्णु चरण-फल काम ।।
पहुंचा, विश्वनाथ दर्शन को भक्तों की थी, भीड़ अपार ।
घंटा, शंख विविध वादन से, कभी न पा सकते थे, पार ।।
सजी आरती क्या शंकर की, शंकरमय था, जन-समुदाय ।
कीर्तन-भजन, गीत, पुष्पांजलि, से मज्जित था, मित या दाय ।।
शंकर के दर्शन कर देखे, कितनी घाटों की नगरी ।
नन्दी से वे काम धेनुएं राजमार्ग पर थीं, पसरी ।।
क्या संकटमोचन की महिमा, आर्तजनों के मंत्रोच्चार ।
हव्य, हवन, आरती बताती, कैसे वे षोडश उपचार ।।
विद्यामंदिर में शिव देखा, उनका धवल धार अभिषेक ।
क्या अनुरक्ति, प्रपत्ति, भक्ति थी, जय-जय-जय, शिव, शम्भु महेश ।।
                                                                             -नियति निसर्ग

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