कलकत्ता की काली
-प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय
काली, कलकत्ता की महिमा, वर्षों का यह अद्भुत नाम ।
मन से माता की पुकार की, पूर्ण मनोरथ, मंगल काम ।।
कोई भक्त निराश न लौटा, माता का उद्भुत वरदान ।
सबकी झोली उसने भर दी, बंगभूमि का यह अवदान ।।
समय शिला के कालचक्र, धारण करतीं, काली माता ।
इसीलिए, शिवशक्ति विराजित, अशरण शरण नाम ख्याता ।।
माता आत्मोत्सर्ग चाहतीं, आत्मत्याग, सत्कर्म महान ।
दीन-दलित के आंसू पोंछे, ऐसी बलि पर टिकता, ध्यान ।।
अन्य जीव, पशुबलि से होगा, कभी न माता का श्रृंगार ।
मां को करुणा, स्नेह चाहिए, माया, ममता की आगार ।।
राजा से हैं, रंक भागते, माता के दर्शन को ।
मलिन, दीन, हीन, आतुर, लुंचित, मुंचित लंगर को ।।
भैरव के भक्तों का मेला, लगता, माता के दरबार ।
मां की करुणा दीन जनों पर दर्शन चाहे, बारंबार ।।
-नियति निसर्ग से.

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