गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012


           कलकत्ता की काली

                     -प्रोफेसर श्यामलाल उपाध्याय


काली, कलकत्ता की महिमा, वर्षों का यह अद्भुत नाम ।
मन से माता की पुकार की, पूर्ण मनोरथ, मंगल काम ।।
कोई भक्त निराश न लौटा, माता का उद्भुत वरदान ।
सबकी झोली उसने भर दी, बंगभूमि का यह अवदान ।। 
समय शिला के कालचक्र, धारण करतीं, काली माता । 
इसीलिए, शिवशक्ति विराजित, अशरण शरण नाम ख्याता ।।
माता आत्मोत्सर्ग चाहतीं, आत्मत्याग, सत्कर्म महान । 
दीन-दलित के आंसू पोंछे, ऐसी बलि पर टिकता, ध्यान ।। 
अन्य जीव, पशुबलि से होगा, कभी न माता का श्रृंगार । 
मां को करुणा, स्नेह चाहिए, माया, ममता की आगार ।। 
राजा से हैं, रंक भागते, माता के दर्शन को । 
मलिन, दीन, हीन, आतुर, लुंचित, मुंचित लंगर को ।। 
भैरव के भक्तों का मेला, लगता, माता के दरबार । 
मां की करुणा दीन जनों पर दर्शन चाहे, बारंबार ।। 

                                                      -नियति निसर्ग से. 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें