मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012


विज्ञान 

  
मैं हूँ, केवल मैं
भू लोक से अन्तरिक्ष तक
मात्र मेरा प्रसार
पद तल भूगोल
कर-तल आकाश
यश के गीत
मन के भाव
युद्ध और शान्ति
काल और क्रान्ति
अस्त्र-शस्त्र छद्मवेश
विविध ब्रह्मास्त्र 
अग्निशर प्रक्षेपक
शोणित का तर्पण
व्यथा विश्व की बढ़ाने को-
त्रास, भय, ह्रास
मुमूर्षा और विथकन ।

पर दृष्टि-भेद से 
ऋषि सा अवधूत
मेरी पताका कीर्ति
यत्र-तत्र-सर्वत्र
विविध तकनीकी प्राचुर्य-
अणु, ऊष्मा, औषध
प्रजनन, प्रत्यारोपण
भूगर्भ, अर्णव, अन्तरिक्ष
शिक्षा का माध्यम
गति-अनुगति का प्रेरक
केशर, गुलाब से
पुष्पित वसुधा तल
वायु के बिखरने को
सुरभि-प्रसार
यही मेरे रचना विधान । 

विश्व के नियामक
नए प्राण, नई स्फूर्ति
चेतना नव्य, कायाकल्प
भावगम्य, भव्य
अनादि पुरुष जर्जर
पर नव्य के
नूतन श्रृंगार से
वसुधा बसाने को
मैं हूँ, केवल मैं-
विज्ञान । 

अक्षरशः सत्य
विज्ञान देव 
और सुनें-
सुना उद्घोष स्वर
एक दिव्य वाणी का-
देवाधिदेव विज्ञान
सक्षम प्रशान्त-
बुद्धि के त्यौहार
देव लोक के चीत्कार,
क्षुब्ध खिन्न मलिन
और भय से भयातुर
हैं स्वर्ग के सम्राट । 
मात्र केवल एक प्रश्न-
आशंका आपतन की । 
यह क्या विज्ञान देव 
या कहें पिशाच देव 
कह लें धर्मराज या
यम कहें मन से । 

वृत्ति सात्विक शमित
घोर तामस के तमिस्र में
सब कुछ सर्वत्र रहा
आश्रित विज्ञान के ।
मानव की महान यात्रा
लोक चन्द्रलोक से
गतिमय मंगल की ओर । 

देव-दानव युद्ध में 
कल और छल ले
नय और नीति से
दानव विजित पर
मानव-देव युद्धरत 
घोर कलिकाल में । 

सारे देव वर्ग के 
रखे रह जाएंगे 
कौतुक अपार वे 
विजय होगी स्वप्न 
पर मानव से मुक्ति
नहीं देवों के वश में । 

नर-सुर संग्राम में
देवता पराजित हैं
अपराजेय मानव से । 
फलतः देव वर्ग आज
मानव का क्रीतदास
जीता सर्वहारा बन । 

मनु-संतानों की इंगिति पर
बना दारु योषित
फिर भी मन-वाणी से
भूरि-भूरि प्रस्तुत आशीष को । 
घोर रावणत्व ने
पोषित मनुजत्व से
कर दी समाप्त मर्यादा 
रामत्व की । 

मुहुर्मुहुर्अट्टहास-
निर्वासित त्रेता के राम
द्वापर राम निःशस्त्र 
कलकी राम काल के रहे
कल्पित उपेक्षित अज्ञात । 

गीता के सुघोष
मूक स्वर में
विज्ञान शमित
ऐसे सुने जाते
छोड़ धर्म-कर्म सारे
नीति-नय अस्त्र-शस्त्र
हो प्रपन्न कर ग्रहण 
प्रणत-पाल विज्ञान । 

पाप-पुण्य मुक्त हों
अहि से अहल्या 
पुष्प-वृष्टि हो रही 
दुंदुभि के उच्च स्वर
सरगम के माध्यम से
शंकर के डमरू से
मात्र ये विवेक श्रुत
स्वस्ति देव, स्वस्ति
तवास्तु विज्ञान देव !
कृष्णार्पण, कृष्णार्पण । 
             
              -नियति न्यास 

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