मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

१. कवि-मनीषी

कवि-मनीषी  


साधना संकल्प करने को उजागर
औ' प्रसारण मनुजता के भाव
विश्व-कायाकल्प का बन सजग प्रहरी
हरण को शिव से इतर सन्ताप
            मैं कवि-मनीषी ।

अहम् ईर्ष्या जल्पना के तीक्ष्ण खर-शर-विद्ध
लोक के श्रृंगार से अति दूर
बुद्धि के व्यभिचार से ले दंभ भर उर
रह गया संकुचित करतल मध्य
मैं कवि-मनीषी ।

          -नियति न्यास

1 टिप्पणी:

  1. प्रोफ.साहब की कविता 'मैँ कवि मनीशी' कवि के मनोभावोन कि सुन्दर अभिव्यक्ति के साथ स्रिजन्धर्मियोँ के लिये सकरत्मक सन्देश है.बधाइ व शुक्रिया.
    डा. रघुनाथ मिश्र्

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