गन्तव्य
कर्कश ध्वांक्ष नील
धूमिल आकाश
सप्तमी के शिरस्थ
कृष्ण पक्षीय
चन्द्रमा का तिरोधान ।
छाया के कंकाल दो
खड़कती खिड़कियों पर
प्रत्यूष के तिमिर पुत्र
प्रातः मध्याह्न गोधूलि में
निमज्जित
अट्टहास गर्जन को प्रस्तुत
प्रकृति के प्रांगण में ।
प्रेतात्मा, काल अथवा मृत्यु !
वृक से विकराल
तीव्रता से तीव्र
अण्डज, पिण्डज
ऊष्मज, स्थावर
या जंगम के अबाध पश्न ।
युग्म कंकाल अदृश्य
नगर के निर्विवाद
कोलाहल के सड़ान्ध से ।
निद्रा स्वप्न शनैः-शनैः
गंतव्य की ओर
कवि का लोक
आलोकित -
सुरभित नवलोक तुमुल
हास और कृन्दनयुक्त,
पर काल की विभीषिका
मात्र एक प्रश्न से आक्रान्त
सदय मत्स्य न्याय
नीर-क्षीर-विवेक
प्रेमालिंगन
नपुंसन पुंसन वा ।
-नियति न्यास
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें