मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012


गन्तव्य

कर्कश ध्वांक्ष नील
धूमिल आकाश
सप्तमी के शिरस्थ
कृष्ण पक्षीय 
चन्द्रमा का तिरोधान । 

छाया के कंकाल दो
खड़कती खिड़कियों पर
प्रत्यूष के तिमिर पुत्र
प्रातः मध्याह्न गोधूलि में 
निमज्जित
अट्टहास गर्जन को प्रस्तुत
प्रकृति के प्रांगण में । 

प्रेतात्मा, काल अथवा मृत्यु !
वृक से विकराल
तीव्रता से तीव्र 
अण्डज, पिण्डज
ऊष्मज, स्थावर 
या जंगम के अबाध पश्न । 
युग्म कंकाल अदृश्य 
नगर के निर्विवाद
कोलाहल के सड़ान्ध से ।

निद्रा स्वप्न शनैः-शनैः 
गंतव्य की ओर
कवि का लोक
आलोकित -
सुरभित नवलोक तुमुल
हास और कृन्दनयुक्त,
पर काल की विभीषिका
मात्र एक प्रश्न से आक्रान्त 
सदय मत्स्य न्याय
नीर-क्षीर-विवेक
प्रेमालिंगन
नपुंसन पुंसन वा । 

             -नियति न्यास 

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