कहीं देर न हो जाय !
अल्फ्रे़ड पार्क, आज शहीद उद्यान,
तीर्थराज, तीर्थस्थल
क्रान्तिकारी के प्रति सर्वोत्तम सम्मान ।
मां की ममता छोड़, भारतमाता के लिए
अन्त तक जूझता रहा, कर दिया, आत्मोत्सर्ग,
आत्म बलिदान ;
पर मां के बिखरे आंसू आज मांग रहे,
भारत के आधुनिक नौनिहालों से,
देशभक्तों से उनकी कारगुज़ारी ।
शहीद उद्यान आज बना है -
चोर, बटमारों का अड्डा, सुरक्षा केन्द्र ।
भारत माता का विशाल उद्यान बन गया -
आतंक, स्कैम, घोटालों का नन्दन-कानन
जहां स्नेहिल मलय पवन का आनन्द ले रहे,
देश के धनपति, प्रहरी नेता
और जनमानस उनका अनमत अनुगत ।
चन्द्रशेकर की दिवंगत आत्मा
उन पर अट्टहास करती, उन्हें धिक्कार रही -
भारतमाता के सपूतो !
बेच दो, राष्ट्र को, उसकी बची-खुशी मिट्टी को ;
शहीद के प्रति सच्ची अनुपम श्रद्धांजलि,
यही होगा, तुम्हारा महत्तम बलिदान,
सर्वोत्तम अवदान ।
तुम्हारी यशःकीर्ति का जीवन्त साक्ष्य !
कहीं देर न हो जाय ! !
-नियति निसर्ग
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें