बुधवार, 31 अक्टूबर 2012


कहीं देर न हो जाय !


अल्फ्रे़ड पार्क, आज शहीद उद्यान, 
तीर्थराज, तीर्थस्थल
क्रान्तिकारी के प्रति सर्वोत्तम सम्मान । 
मां की ममता छोड़, भारतमाता के लिए
अन्त तक जूझता रहा, कर दिया, आत्मोत्सर्ग, 
आत्म बलिदान ; 
पर मां के बिखरे आंसू आज मांग रहे, 
भारत के आधुनिक नौनिहालों से, 
देशभक्तों से उनकी कारगुज़ारी । 

शहीद उद्यान आज बना है - 
चोर, बटमारों का अड्डा, सुरक्षा केन्द्र । 
भारत माता का विशाल उद्यान बन गया - 
आतंक, स्कैम, घोटालों का नन्दन-कानन 
जहां स्नेहिल मलय पवन का आनन्द ले रहे, 
देश के धनपति, प्रहरी नेता 
और जनमानस उनका अनमत अनुगत । 

चन्द्रशेकर की दिवंगत आत्मा 
उन पर अट्टहास करती, उन्हें धिक्कार रही - 
भारतमाता के सपूतो !
बेच दो, राष्ट्र को, उसकी बची-खुशी मिट्टी को ;
शहीद के प्रति सच्ची अनुपम श्रद्धांजलि, 
यही होगा, तुम्हारा महत्तम बलिदान, 
सर्वोत्तम अवदान । 
तुम्हारी यशःकीर्ति का जीवन्त साक्ष्य !
कहीं देर न हो जाय ! ! 

                     -नियति निसर्ग 

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