राष्ट्रभाषा के स्वर
-श्यामलाल उपाध्यायजिसके भाषी अधिक जन, बसते हों उस देश ।
उसे राष्ट्रभाषा कहें, सहज शारदा शेष ।।
जो भाषा साहित्य से, अति समृद्ध हो जाय ।
भाषा है अधिकारिणी, अतिशय आदर पाय ।।
जिस भाषा में शब्द हों, विस्तृत और समृद्ध ।
वही राष्ट्रभाषा बने, हो सर्वोपरि सिद्ध ।।
क्षेत्र बड़ा व्यवहार में, व्यापक औ' विस्तीर्ण ।
वही राष्ट्रभाषा बने, सदा-सदा उत्तीर्ण ।।
लक्ष्मण, शिवप्रसाद से लल्लू, सदल मिश्र से खान ।
लाल सदासुख वीर थे, इनकी ही बस जान ।।
नव जागरण बीज बो, हरिश्चन्द्र से वीर ।
जैसे बाल, प्रताप थे, ऐसे थे वे धीर ।।
हिन्दी होकर अग्रणी विश्व स्तर यह पाय ।
बने विश्वभाषा कहीं, भारत बलि-बलि जाय ।।
हिन्दी के स्वर गा रहे, तुलसी, सूर, कबीर ।
गांधी, काका, सन्त ने, हर ली सबकी पीर ।।
जयशंकर से देविका, कहीं निराला पंत ।
हिन्दी के स्वर साधकर, सभी हुए श्रीमन्त ।।
वर्षों से हम गा रहे हिन्दी के वे गान ।
जनगण की भाषा बने, रख ले सबका मान ।।
घर बाहर हिन्दी चले, राह हाट बाजार ।
गांव नगर हिन्दी चले, सात समुन्दर पार ।।
हिन्दी पारस रूप है, स्वर्ण बनाती आप ।
जनमानस को ज्ञान दे, हर लेती परिताप ।।
हिन्दी का चिन्तन सहज, हिन्दी का आचार ।
हिन्दी के संस्कार से, बनते आप विचार ।।
हिन्दी भाषा देश की, क्या साहित्य बनाय ।
इसकी दीपित दीप्ति से, धरा दीप्त हो जाय ।।
-नियति निसर्ग
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