रविवार, 17 फ़रवरी 2013


राष्ट्रभाषा के स्वर

   -श्यामलाल उपाध्याय 

जिसके भाषी अधिक जन, बसते हों उस देश ।
उसे राष्ट्रभाषा कहें, सहज शारदा शेष ।।

जो भाषा साहित्य से, अति समृद्ध हो जाय ।
भाषा है अधिकारिणी, अतिशय आदर पाय ।।

जिस भाषा में शब्द हों, विस्तृत और समृद्ध ।
वही राष्ट्रभाषा बने, हो सर्वोपरि सिद्ध ।।

क्षेत्र बड़ा व्यवहार में, व्यापक औ' विस्तीर्ण ।
वही राष्ट्रभाषा बने, सदा-सदा उत्तीर्ण ।।

लक्ष्मण, शिवप्रसाद से लल्लू, सदल मिश्र से खान ।
लाल सदासुख वीर थे, इनकी ही बस जान ।।

नव जागरण बीज बो, हरिश्चन्द्र से वीर ।
जैसे बाल, प्रताप थे, ऐसे थे वे धीर ।।

हिन्दी होकर अग्रणी विश्व स्तर यह पाय ।
बने विश्वभाषा कहीं, भारत बलि-बलि जाय ।।

हिन्दी के स्वर गा रहे, तुलसी, सूर, कबीर ।
गांधी, काका, सन्त ने, हर ली सबकी पीर ।।

जयशंकर से देविका, कहीं निराला पंत ।
हिन्दी के स्वर साधकर, सभी हुए श्रीमन्त ।।

वर्षों से हम गा रहे हिन्दी के वे गान ।
जनगण की भाषा बने, रख ले सबका मान ।।

घर बाहर हिन्दी चले, राह हाट बाजार ।
गांव नगर हिन्दी चले, सात समुन्दर पार ।।

हिन्दी पारस रूप है, स्वर्ण बनाती आप ।
जनमानस को ज्ञान दे, हर लेती परिताप ।।

हिन्दी का चिन्तन सहज, हिन्दी का आचार ।
हिन्दी के संस्कार से, बनते आप विचार ।।

हिन्दी भाषा देश की, क्या साहित्य बनाय ।
इसकी दीपित दीप्ति से, धरा दीप्त हो जाय ।।

-नियति निसर्ग


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