मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013


चिड़िया रैन बसेरा !


तिनके-तिनके जोड़े, कितने, कितनी ईंटें बालू ;
कितने दिन का था, यह डेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कितने-कितने खून बहाये, दौलत के अम्बार लगाए ;
क्षण में टूट गया, वह बेड़ा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कितने बने सिकन्दर आए, बड़े लुटेरे ही कहलाये ;
देख लिया, इस जग का मेला, चिड़िया रैन बसेरा ।

ईसा हों या मूसा प्यारे, राम, कृष्ण, जिन, बुद्ध हमारे ;
छोड़ गये, अपना क्या हेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कैसा, यह संसार बनाया, इसमें क्या न यहां उपजाया ;
चार दिनों का था, यह घेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

मुट्ठी बांध सभी थे, आए, बहुत किया, पर, कितना पाये ;
कल का पाया, नहीं, सवेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कल ही मुकुट बंधा था, प्यारे, हाथ हुए, हल्दी के न्यारे ;
सिन्दूर मिटा गया, वह फेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

कहां गये, वे अनुभव सारे, कल पर तुमने सब कुछ वारे ;
चार दिनों का गया, सवेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

तुम तो बल विवेक थे, पाए, कभी न मन में इनको लाये ;
बाजी हारी, क्या हिय हेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

जी लो, बस निज कर्म सहारे, जीवन में तुम सब कुछ हारे ;
रही, सोच, मेरा, क्यों तेरा, चिड़िया रैन बसेरा ।

-नियति निक्षेप

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