रविवार, 17 फ़रवरी 2013


पर्यावरण 

   -श्यामलाल उपाध्याय 

युग ने कहां रचा पुरुष, युग पौरुष अवदान ।
वह अपने पुरुषार्थ से, बनता, सदा महान ।।
जो जग देखा था कहीं, नहीं रहा, वह आज ।
क्या आश्चर्य बना, जगत, सजता, अनगिन साज ।।
आर्य परम्परा का जीवन था, प्रकृति मूल आधार ।
इसीलिए झंकृत हुए, मंत्ररूप में इसके तार ।।
जन ने अवहेला की इसकी, कदाचार इससे आरम्भ ।
ईति-भीति, भय-ताप, आधि और व्याधि हुई प्रारम्भ ।।
प्रकृति चलाए दमन चक्र, इसका जन उत्तरदायी ।
अपने बल पौरुष से है, वह, बना, आज विषपायी ।।
यह विषपान बनेगा, घातक, क्या शंकर बन पाएगा ।
मानव का अतिक्रमण उसे, बस, अंधक, महिष बनाएगा ।।
मानव का आगम हितकर, सुखकर कैसे हो पाएगा ।
सन्तुलन विकल्प की भाषा, पर्यावरण सिखाएगा ।।
कहीं फूल की कलियां रोतीं, कहीं खिले, वे फूल ।
कहीं सुकोमल पत्र बिलखते, आतुर बने, समूल ।।
कहीं सरीसृप, कीट, भृंग, असहाय सांस को तरसें ।
कहीं वन्य पशु, कहीं पालतू, प्राण विकलता परसें ।।
अपने दुष्कर्मों के फल, मानव विलुप्त हो जाएगा ।
अनुशासन-विरमित कर्मों का, कहीं उचित फल पाएगा ।।
प्रकृति सहचरी बनी रहे, तादात्म्य रहे, जीवन भर ।
व्यक्ति असंग, निसंग रूप से जुड़ा रहे, अति दृढ़तर ।।
जब तक उसके पास रहेगा, आधि-व्याधि से दूर ।
वह उसकी कर देगी सारे, काम्य मनोरथ पूर ।।

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