रविवार, 17 फ़रवरी 2013


अबलाओं की पुकार 

-प्रो. श्यामलाल उपाध्याय 

बहन-बेटियां बिलख रहीं हैं, भरी नींद सो रहा देश । 
भय-कातर ललनायें टूटीं, यह तुम तक संदेश ।। 

समय आ गया, अब संसद को, आर्तनाद सुनना होगा । 
द्रौपदियों को विपदाओं से, मुक्त उन्हें करना होगा ।। 

बचा नहीं सकते तो ले लो, रहा चूड़ियों का उपहार । 
सत्ता में तुम रह न सकोगे, हुई तुम्हारी कर्कश हार ।।

दुःशासन हैं शासन करते, सता-सताकर देते ताप ।
दामिनियां कड़केंगी ऊपर, सह लेना उनके परिताप ।। 

अबलायें सबलायें होंगी, आग उगलनेवाली । 
नारी जग के आर्तनाद से, भस्मि शिखा बलने वाली ।। 

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