रविवार, 17 फ़रवरी 2013


उन्मेष 

   -श्यामलाल उपाध्याय 

अभाव के कोटर में साधन विहीन
कालान्तर से बैठा निरुद्देश्य जन
ढोता रहा अबाध
अतीत के रोदन प्रलाप
दुर्निवार काल कर्कशता -
जनित विषाद ।

आशा के डिम्ब से
सन्तोष के रसायन प्रलेप
कर्म-साधना की ऊष्मा
और जिजीविषा की
शक्ति से संचालित
सरसे यह जीवन ।

हरने को अवसाद
नव प्रात से संजोया मन
खिले रस मिश्रित
उस मधुमय वसंत से
झंझावात शक्तिहीन सौरभ सम्पन्न मन
नाचे मयूर उस मधुश्री की छांव में ।

जन-मन की शक्ति से
भागे भय जनित भीति उठे, वह वर्ग
पड़ा है, जो शताब्दियों से
समाज की कठोरता से
पीड़ित-प्रकम्पित, पताड़ित-उपेक्षित
अभिशप्त-परित्यक्त ।

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