मेरे अतीत के अनुभव
कोलकाता प्रवास के प्रारम्भिक वर्ष ःपचास वर्ष पूर्व महानगर मेरे लिए एक अपरिचित प्रवास था । एक सामान्य होटल के माध्यम से लोगों से मिल-जुल कर परिचय प्राप्त किया और आवास की व्यवस्था की । महानगर की यात्रा बस, ट्राम द्वारा पांच पैसों में होती थी, भोजन पचास से साठ पैसों में सुलभ था । सामान्य चावल तीस पैसों और बासमती, देहरादून साठ पैसों में एक किलोग्राम आते थे । बंगीय हिन्दी परिषद में तीसरे रविवार की संध्या को आचार्यप्रवर डॉ. ललिता प्रसाद सुकुल, प्रो. रामनारायण सिंह के साथ कई अन्य कवि एवं साहित्यकार आते । कार्यशाला में विषय निर्धारित होते और कवि अपनी रचनाएं, उपोक्तियां सुनाते ; बड़ा आनन्द आता । परिचय, मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन और सुलभ थे । कुछ ही दिनों में महानगर से लगाव-सा हो गया । पठन-पाठन-अध्यापन के सुयोग भी एक वर्ष के अन्तराल मिलते गए ।
अंग्रेजी माध्यम की पाठशाला-जीवन-शैली ः
मैंने अंग्रेजी माध्यम पाठशाला से बहुत कुछ सीखा । सबसे पहले हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं को सीखने का भरपूर अवसर मिला । अध्यापक, आचार्य-प्राचार्य से लेकर मध्यवित्त, कुलीन, वरिष्ठ अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, सेठ, साहुकार सभी से मिलने का अवसर मिला । सुना था, अंग्रेजी पढ़ने पर नौकरी मिलती है पर हिन्दी नहीं । यहां सब कुछ मिला- हिन्दी, इंग्लिश, मनोनुकूल अध्यापन, संयमित अध्यापकवर्ग अथवा आत्मतोष ।
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