गुरुवार, 15 नवंबर 2012


मेरा आज नमन !


भारत ! तुझको नयी सदी पर, मेरा आज नमन । 

देश-विरोधी दीमक बनकर, देश चाटते जाते । 
धंधों में काला-सफेद कर, मस्ती-मौज मनाते ।। 

कौन लड़े, इन तूफानों से, कैसे राह बनाए । 
कौन जुटाए, साहस कैसे, ऐसे मन के पाए ।। 

चिन्ता बहुत अधिक हम करते, मानव-अधिकारों की । 
उन्हें खोज रखते, सहेजकर, थाती व्यापारों की ।। 

काश ! कहीं चिन्ता होती, हैं, क्या करणीय हमारे । 
कभी नहीं कर्तव्य-विमुख होते, ये प्राणी सारे ।। 

शासन को है, सदा अपेक्षा. बल की, अनुशासन की । 
बिना विवेक और अनुशासन, कहां चली, शासन की ।। 

विघटन है, विनाश का सूचक, घातक एक कुमंत्र । 
नहीं बचाओगे, अपने को और अपना जनतंत्र ।। 

बनकर तुम स्वायत्त, देश को नहीं बचा पाओगे । 
प्रेम, शान्ति, भ्रातृत्व-भाव से दूर चले जाओगे ।। 

एकनिष्ठ, निरपेक्ष राष्ट्र, संप्रभु, स्वायत्त रहेगा । 
विघटन से बच, सार्वभौम-सत्ता के भार सहेगा ।। 

राष्ट्र सोच हो, राष्ट्र कर्म हो, राष्ट्र धर्म सेवा हो । 
जन-मन अर्पित राष्ट्र-भाव हो, शान्ति, प्रेम, श्रद्धा हो ।। 

नयी सोच के अंखुवे तनकर, नये प्राण विकसाएं । 
अन्धकार, निर्धनता, शोषण आप स्वयं सर जाएं ।। 

लो, संकल्प, उठाओ, खरशर, अपने तन-मन-धन । 
भारत ! तुझको नयी सदी पर, मेरा आज नमन ।। 

                                                   -नियति निक्षेप 

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